गुरुवार, 10 जुलाई 2008

शादी: करना और होना

कल मैं अपने कमरामित्र श्याम से बात कर रहा था। हम दोनों के एक परिचित मित्र के बारे में बात चल निकली। श्याम बोला "यार उसकी तो शादी हो गयी"।

यह पहली बार नहीं है कि मैंने ये शब्द किसी के मुख से सुने थे, लेकिन इस बार थोड़ा अजीब सा लगा। "उसकी शादी हो गयी, या उसने शादी कर ली?"

"एक ही बात है यार"

"एक बात नहीं है। शब्दों में मतलब छुपे होते हैं - उदाहरण के लिये ज़रा सोचो - उसको बीमारी हो गयी, या उसने बीमारी कर ली। दोनों में कितना फ़र्क है"

श्याम तुनक उठा "यार तुम हमेशा डीटेल में क्यों जाने लगते हो। तुम चैंपियन है, तुम चैंपियन है"

हालांकि बात थी हंसी मज़ाक में, लेकिन ज़रा सोचिये - यदि आप कहते हैं कि "मेरी तो शादी हो गयी" - क्या एसा एहसास नहीं होता सुन कर जैसे कि कर्ता तो कोई और था, आप सिर्फ साधन मात्र थे? क्या एसा कहने से एक "विवशता" या "निष्क्रियता" का बोध नहीं होता?

ज़रा दूसरे कोण से भी सुन लीजिये:
"यार मैंने तो शादी कर ली"

अब कैसा लगा?

शब्दों में गहराई होती है, किसी को भी दिख सकती है। ध्यान से इस्तेमाल करें!

2 टिप्‍पणियां:

PD ने कहा…

maine to comment kar diya..
ya fir
aapko mera comment mil gaya..
:)

Anil ने कहा…

अापने कमेंट किया, और मैंने लिया!