सोमवार, 4 अगस्त 2008

तो क्या इस गर्भपात को अनुमति दे दी जाये?



निकेता और हरेश मेहता अपने भविष्य के लिये लड़ना चाहते हैं। निकेता के गर्भ में पल रहे भ्रूण ने उन्हें पैदा होने से पहले ही तकलीफें देनी शुरू कर दी हैं। वे नहीं चाहते कि ये शिशु पैदा हो।

१० साल पहले तक शायद इस विषय पर कोई भी विचार न करता, लेकिन आजकल ऐसे विषय सिर्फ अदालती न रहकर सामाजिक विषयों में तब्दील हो रहे हैं। इस मामले में सिर्फ "न्याय" और "डाक्टरी" नहीं हैं, महँगाई, नैतिकता और व्यवहारिकता सभी की खिचड़ी-सी बनी हुयी है।

इस केस के कुछ पहलुओं पर विचार करें:

भारतीय गर्भपात नियम के अनुसार पाँच महीने तक गर्भपात किया जा सकता है, लेकिन उसके बाद भ्रूण परिपक्व हो जाता है। (आधुनिक चिकित्सा पाँच महीने पर पैदा हुये कुछ भ्रूणों को बचा चुकी है) इसलिये कानूनन ऐसा मान लिया गया है कि पाँच महीने के बाद भ्रूण को नहीं गिराना चाहिये क्योंकि वह हत्या-समान होगा। कानून में केवल एक ही अपवाद है - यदि भ्रूण की वजह से माँ की जान को खतरा होता है, तो उसे किसी भी समय गिराया जा सकता है।

इस केस में माँ को कोई शारीरिक खतरा नहीं है। लेकिन भ्रूण के दिल में तंत्रिकायें मर चुकी हैं, और दिल ठीक से धड़काने के लिये उसे पैदा होते ही पेसमेकर लगाना पड़ेगा। पेसमेकर एक मशीन है जो दिल में कृत्रिम विद्युत का प्रवाह करके उसे ठीक से धड़का सकती है। इसका खर्चा लगभग १ लाख रुपये लगेगा। यह पेसमेकर कुछ सालों तक चलेगा, और बैटरी खत्म होने पर उसे बदलना होगा - याने कि फिर से १ लाख रुपये का खर्चा। यदि ये भ्रूण किसी तरह से पैदा होकर जिंदा बच जाता है, और ६० साल की आयु तक जीता है, तो कम से कम १५-२० लाख रुपये का अनुमानित खर्चा रहेगा, और हर बार पेसमेकर बदलवाने के लिए कई महीने अस्पताल में बिताने पड़ेंगे। इतना खर्च करने के बाद भी कोई गारंटी नहीं कि वह पूरी तरह सामान्य जीवन व्यतीत कर सके।

निकेता कहती हैं कि वे अपने बच्चे को रोज़ाना अपनी आंखों के सामने तिल-तिल कर मरते नहीं देख सकतीं।

ये निकेता और हरेश का पहला बच्चा होगा। इसके बाद होने वाले बच्चों के पालन-पोषण के लिये भी उन्हें पैसा चाहिये होगा। बढ़ती महँगाई के इस मौसम में निकेता और हरेश अपने आप को इस बच्चे पर होने वाला खर्च नामुमकिन लगता है। हालांकि एक गैर-सरकारी संस्था ने निकेता और हरेश को बच्चे के इलाज के लिये पैसे देने का ऐलान किया है, लेकिन उन्होंने ये पेशकश ठुकरा दी है, और कचहरी के चक्कर काट रहे हैं।

एक प्रश्न ये भी है कि भ्रूण को इतनी गंभीर दिल की बीमारी है तो इसका पता पहले क्यों नहीं लगा? डाक्टरों का कहना है कि कुछ बीमारियाँ देर से ही पता चलती हैं, इसे आप प्रकृति का नियम भी समझ सकते हैं। पाँच महीने से पहले इस बीमारी का पता लगाना बहुत मुश्किल है, और पाँच महीने के बाद पता लगने पर गर्भपात नहीं किया जा सकता।

दूसरी ओर यह भी अनुमान लगाये जा रहे हैं कि निकेता और हरेश अकेले नहीं हैं, कई और भी हैं उनके जैसे। लेकिन शायद वे डॉक्टर और कानून के पचड़ों में न पड़ते हुए झोला-छाप डॉक्टरों के पास जाकर अपनी समस्याओं का निदान पा लेते हैं। ऐसी हालत में यदि इस केस को कोर्ट ने पास करके कानून में संशोधन कर दिया, तो शायद वे सब अस्पताल में बढ़िया डॉक्टरों की देखरेख में रहेंगे न कि झोला-छाप डॉक्टरों के पास।

कानून के अलावा कुछ तथ्य ऐसे भी हैं जो इसके विपरीत जाते हैं । पाँच महीने के बाद गर्भपात करना माँ की सेहत के लिये खतरनाक हो सकता है, क्योंकि भ्रूण बहुत बड़ा हो चुका है।

तो क्या इस गर्भपात को अनुमति दे दी जाये?

मैं समझता हूं ये किसी के लिये भी बहुत बड़ा धर्मसंकट है। इसे सुलझाना आसान नहीं, लेकिन कुछ देर के लिये नियम-कानून-डाक्टरी से बाहर निकलकर एक आम आदमी की तरह सोचा जाये। यदि कोर्ट ये याचिका ठुकरा देता है, तो ये बच्चा पैदा होगा, और शायद कुछ हद तक अपना रोज़मर्रा का जीवन भी ठीक से गुज़ार ले, लेकिन पूरी तरह सामान्य नहीं हो पायेगा। सोचिये ये बच्चा यदि फुटबाल खेलेने निकले, और दिल की धड़कन में कोई दिक्कत आ जाये, तो अस्पताल पहुंचने से पहले ही मौत होने के आसार रहेंगे। ऐसी हालत में उस अनहोनी के लिये कौन जिम्मेदार होगा?

एक आम आदमी जैसे सोचते हुये मुझे यही लगता है कि कोर्ट को निकेता और हरेश की सुननी चाहिये, ताकि वे अपना समय और पैसा दूसरे बच्चे में लगाकर एक उज्जवल भविष्य का सपना देख सकें।

आपका क्या कहना है?

3 टिप्‍पणियां:

रंजन ने कहा…

जब पता है की बच्चा किसी विकृति का शिकार है.. तो निकिता तो चुनने कि आजादि होनी चाहिए.. उसका intension गलत नहीं है.. या फिर सरकार को बच्चे के भरण पोषण कि व्यवस्था करनी चाहिये.. ताकि वे इस बच्चे का और दुसरे होने वाले बच्चे का भरण पोषण कर सकें..

क्या बात है.. सैकड़ो गर्भपात रोज़ बिना किसी जायज वजह से हो रहे है.. और अगर कोई दरवाजे पर आये तो कानुन ठेंगा दिखा रहा है..

राज भाटिय़ा ने कहा…

इस केस मे सीधे देखा जाये तो गर्भपात करवा लेना चहिये. ओर अदालत को भी इस बात की इजाजत दे देनी चाहिये, लेकिन इस के दुरपरिणाम ज्यादा होगे, जो लोग आज कन्या का पता चलते ही गर्भपात करवाते हे उन्हे फ़िर एक बहाना मिल जायेगा जायज बहाना, ओर जो डा० आज चोरी चोरी यह काम करते हे कल को वो खुल कर झुटा प्रणाम प्त्र दे कर काम आजदी से करे गे, शायद यही बात जज भी सोचते होगे...

Heena Insan ने कहा…

बेटो से वंश चलने की बात कहने वाले समाज में नयी सोच जागृत करने के उद्देश्य से डेरा सच्चा सौदा के पूज्य गुरु संत गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सा ने बेटियों से वंश चलाने की एक नयी मुहीम का आगाज किया है और इस रीत को ''कुल का क्राउन'' का नाम दिया है । dailymajlis.blogspot.in/2013/01/kulkacrown.html