रविवार, 3 अगस्त 2008

सुंदरता का एक पहलू बर्बरता भी है

अरविन्द मिश्रा जी की इस पोस्ट को पढ़ कर मेरा भी कुछ मन किया अपने मन के ख़यालों को उड़ेलने का।

क्या सुन्दरता का एक पहलू बर्बरता भी है?

बिल्कुल है जी!

आपकी टाँगों और हाथों को अधिक खूबसूरत बनाने के लिये यदि कोई आपके ऊपर पिघला हुआ गरम मोम डालकर उसे ठंडा करके खींच डाले तो कैसा लगेगा आपको? सारे बाल जड़ों समेत निकल आयेंगे। क्या आप चीखेंगे? यार मैं तो चीख पडूँगा। लेकिन यह औरत नहीं चीखेगी। क्योंकि उसे पता है कि जब सूजन कम होगी, तब अंदर से "नई-नवेली त्वचा" निकलेगी जो उसकी सुंदरता में चार-चांद लगायेगी।



अपनी चाल को खूबसूरत बनाने के लिए आप तिरछे तले वाले जूते पहनेंगे? फिर चाहे आर्थ्राइटिस ही न क्यों न हो जाए? यार मैं तो नहीं पहनूंगा। लेकिन कुछ औरतें पहनती हैं ताकि न सिर्फ़ उनकी चाल लचकदार बने, बल्कि उनकी "इमेज" ऊंची हो और कद भी।



और आजकल तो पुरुष भी पीछे नहीं हैं इस मामले में। यदि आपकी चमड़ी में सुई घुसेड़ कर हज़ारों बार नोचा जाए, तो आपको कैसा लगेगा? यार मुझे तो बहुत बुरा लगेगा। मानो बुश और लादेन दोनों के प्रताड़ना के तरीकों को मिलकर नया तरीका ईजाद करके मुझपे आजमाया हो। मैं तो कतई नहीं करने दूँगा किसी को अपने ऊपर ऐसा. लेकिन इन महाशय को देखिये - खूब करवाया है।


और तनिक यहाँ भी देखें:


इन बेचारे जानवरों को लाइन में क्यों लगा रखा है? भाई कुछ ख़ास नहीं, इनकी आंखों में कुछ सौंदर्य-उत्पाद डाले गए हैं ताकि उनके दुष्प्रभावों का पता चल सके। यदि ये अंधे हो गए या मर गए, तो समझो कि उत्पाद कामयाब नहीं रहा, उसे फ़ेंक कर नया बनाया जाए।

दिखाने को आगे और भी है, लेकिन ज्यादा दिखाऊंगा तो आपको भी उल्टी आ जायेगी और मुझे भी। इसलिए यहीं समाप्त करता हूँ।

राम बचाए ऐसी सुन्दरता से! मैं जैसा हूँ वैसा ही अच्छा हूँ।

7 टिप्‍पणियां:

vipinkizindagi ने कहा…

सुन्दरता ..........बर्बरता


bahut achcha .
mazedaar....

zeashan zaidi ने कहा…

मैं एक ही बार ब्यूटी पार्लर गया था. वहां इतना कष्ट हुआ कि दुबारा कभी नही गया.

Lovely kumari ने कहा…

बाप रे बाप!! हम बदसूरत ही भले

राज भाटिय़ा ने कहा…

सभी की समझ मे यह आ जाये तो दुनिया कितनी खुब सुरत लगे, अनिल जी आप की बात से मे सहमत हू, ओर धन्यवाद इस अच्छे लेख के लिये

Arvind Mishra ने कहा…

जी हाँ .आप ने दुरुस्त फरमाया है -सुन्दरता के पीछे एक बदसूरती का भी पहलू है ,एक आमानवीयता है ,घिनौने व्यावसायिकता है /

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

मैं जैसा भी हूं, सामने हूं तेरे, मुझे कुछ छुपाने की आदत नहीं है । सहीं कहा आपने .....

दिवाकर प्रताप सिंह ने कहा…

विधाता की रचना में त्रुटि निकाल कर किया गया 'मेक-अप' सौन्दर्य नहीं 'मृग-मरीचिका' है ! सौन्दर्य तो सहज सत्य है, सही कहा है आपने "राम बचाए ऐसी सुन्दरता से! मैं जैसा हूँ वैसा ही अच्छा हूँ।"