शनिवार, 28 मार्च 2009

लोकतांत्रिक घूँसा


एक मित्र की हाल ही में शादी हुयी. वह अपने परिजनों को साथ लेकर मैरिज सर्टिफिकेट बनवाने पहुँचा. कुर्सी पर बैठे सरकारी अधिकारी ने काम करने के दस हज़ार रुपये लिये. दिन में वह न जाने कितने सर्टिफिकेट बनाता होगा, हरेक के हजारों रुपये लेकर लोकतंत्र को चूना लगाता होगा. उसका हर सर्टिफिकेट भारत की लोकतांत्रिक नींव को दीमक की तरह खोखला करता जाता है.

दिल्ली में चलने वाले तिपहिया आटोरिक्शा वाले मीटर से कभी नहीं चलते. जहाँ दस रुपये लगने चाहिये वहाँ पचास माँगते हैं. रोज करोड़ों रुपये लूटे जाते हैं, और ट्रैफिक पुलिस वाले देखते रहते हैं.

एक दिन एक अजब नज़ारा देखा. दिल्ली में एम्स के चौराहे पर कुछ लडकों ने एक ब्लू लाइन बस रुकवाई. बस के ड्राइवर को नीचे उतार कर डंडे और चेन से पीटा, और कहा कि बस समय से पहले न लाये. ज़ाहिर था कि उसके "प्रतिद्वंद्वी" ने उन लडकों को उसे पीटने भेजा था. बस में बैठे, खड़े और लटके पचासों लोगों ने सब देखा. बस-स्टैंड पर बैठे-खड़े सैकड़ों लोगों ने भी देखा. एक पुलिसवाला, जो बगल में पानी बेचने वाले से "हफ्ता" वसूल रहा था, उसने भी देखा. लेकिन किसी ने कुछ न कहा.

सब चुपचाप ही हो गया.

मुंबई पर ऐतिहासिक आतंकवादी हमले में हमारी पुलिस और सेना के जवान कई दिनों तक आतंकवादियों को मार गिराने के लिये गोलीबारी करते रहे, लेकिन बंदूकों से निकली वह हजारों गोलियाँ उन्हें पकडने में बेकार रहीं.

लेकिन आखिरकार मौहम्मद कसब को निहत्थे लोगों ने धर पकड़ा.

जहाँ गोलियाँ काम न कर पायीं वहां लोकतांत्रिक घूँसा काम कर गया.

अराजकता के इस दौर में हमें जरूरत है एक क्रांति की, जो भारतीय युवा के हाथों होगी. जिस दिन लोकतंत्र में जनता का घूँसा चलेगा, उस दिन भारत में लोकतंत्र वास्तव में लोगों का तंत्र बनेगा.

सोती आत्माओं वाले भारतीय लोगो, जागो. लोकतंत्र को तुम्हारा घूँसा चाहिये.

अभी मारो, और जोर से मारो.

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Ever heard about dumbing down the people? How one can expect people esp. youth to fight for national and local causes when they have no awareness about issues?

Please come India and interview some students of prestigious colleges on local/ national issues, try to fathom their rage against system. Then you'll know true (I should say pathatic) state of today's youth.

How come our previous generation was ready to fight against the system for its nation. And our generation can't even think beyond glamor, MBA and opposite sex?

Some year back when I was an undergraduate student, very few students out of 5000 read and understood newspaper editorials, even fewer read books. They too (most of them) read such things for improving English and GK. For their sole aim was to crack some MBA entrance.

beyond them nobody ever bothered to read or watch news. How such fiery youth can raise fist against rotten system? I can't get, call me negative if you must, but I am witnessing something pathetic.

When you come India please read any Hindi newspaper (esp section aimed towards youth, TV news channel (for these are the major sources of information to most Indian youth. You'll know what I am trying to say.

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है
ओ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दोस्तां
देखते की मुल्क सारा ए टशन महफिल में है
आज का लौंडा तो कहता हम तो बिस्मिल थक गए
अपनी आज़ादी तो भैया लौंडिया के दिल में है
आज के जलसों में बिस्मिल एक गूंगा गा रहा
और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है
हाथ की खादी बनाने का ज़माना लद गया
आज तो चड्डी भी सिलती इंग्लिसों की मिल में है

देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है

(from movie Gulaal)

संगीता पुरी ने कहा…

सोती आत्माओं वाले भारतीय लोगो, जागो. लोकतंत्र को तुम्हारा घूँसा चाहिये.

अभी मारो, और जोर से मारो.
बहुत सही कहा है ...

not needed ने कहा…

I saw the comment by anonymous. Wonderfully said! Come out in open, we need you: let us walk together in this struggle for 2nd Independence for India (I hate to use this term, though!). Please visit www.mifindia.org where this post by Dr Anil Kumar is already there in English and drop me a line at pedia333@gmail.com

Munish Raizada