मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

चलता है यार

पिछली बार जब मैं दिल्ली गया, तो इंदिरा गाँधी हवाई अड्डे पर उतरा और अपने सामान के हवाई जहाज से उतरकर आने का इंतजार करने लगा। दो घंटे हो गये लेकिन मेरा सामान नहीं आया। जहाज से उतरे सभी लोग अपना-अपना सामान लेकर जा चुके थे, और रात के तीन बजे मैं वहाँ अकेला आदमी था, जो अपने सामान का इंतजार कर रहा था। थक-हारकर मैं जहाज कंपनी के कार्यालय पहुँचा और उन्हें अपनी परेशानी बतायी। उन्होंने मुझे कस्टम कार्यालय जाकर पता करने को कहा।

कस्टम कार्यालय एक छोटा सा कमरा था, जिसमें एक अधेड़ उम्र के सज्जन विराजमान थे। उन्होंने बताया कि सामान उनके पास ही है, लेकिन काफी अधिक मूल्य का सामान होने की वजह से उन्होंने उसे रोक रखा है। मैंने कहा कि यह सामान मैं हिंदुस्तान में थोड़े ही छोड़कर जाउंगा, ये तो मैं वापस जाने पर अपने साथ ही ले जाउंगा। अत: इसपर कस्टम ड्यूटी नहीं लगायी जा सकती। कोई भी वस्तु नयी नहीं थी, सभी मेरी इस्तेमाल की हुयी पुरानी वस्तुयें थीं जिन्हें मैं अपने रोजमर्रा के उपयोग में लाता हूँ।

उन्होंने पहले से ही सारे सामान का मूल्यांकन भी कर रखा था, कह रहे थे कि "आप तो कम से कम ढाई लाख का सामान लेकर आये हो। इसे छुड़ाने के लिये या तो आप कस्टम ड्यूटी के चालीस हजार रुपये दे दो, नहीं तो मेरे बच्चों की मिठाई के लिये बीस-हजार रुपये देकर छुड़ा लो।"

सीधे-सीधे शब्दों में रिश्वत कैसे मांगी जाती है, ये सज्जन उसका ज्वलंत उदाहरण हैं।

मैंने उन्हें लाख दलीलें दीं कि यह सामान मैं भारत में नहीं छोड़कर जाउंगा, मेरे रोजमर्रा का सामान है, जैसे iPod, दाढ़ी बनाने का सामान, इत्र, टाई इत्यादि। लेकिन वह मानने को तैयार न थे, कहते थे कि पैसे देकर ही सामान लेना होगा। यहाँ तक कि उन्होंने मेरी पीठ पर टंगा बस्ता भी उतरवा कर देखा कहीं उसमें लैपटॉप जैसी कोई मूल्यवान वस्तु न हो। उस बस्ते में दातुन की ब्रश और चड्डी-बनियान के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।

इतने में एक और अधिकारी वहाँ पर टपक पड़े। मेरी तरफ पिता-जैसा व्यवहार करते हुये बोले "बेटे झगड़ा ठीक बात नहीं, नियम कानून तो निबाहने ही पड़ेंगे। यदि इन्हें कुछ पैसे देकर आपका सामान मिल जाये तो इससे अधिक खुशी की क्या बात हो सकती है? इनके बच्चे भी खुश, तुम भी खुश।" भ्रष्टाचार के सभी फायदे एक ही साँस में सुना दिये उन्होंने।

लेकिन मैं थोड़ा सिरफिरा लड़का हूँ। मैं भी अपनी बात पर डटा रहा। आखिरकार दूसरे अधिकारी ने कहा "चलता है यार, अब पैसे दे दे।"

आज मैं अमेरिका में बैठकर यह वर्णन लिख रहा हूँ। यहाँ सभी काम आसानी से होते हैं, बिना रिश्वत के। जिंदगी आसान लगती है। लेकिन जब मैं भारत में होता हूँ, तो इतना बड़ा विरोधाभास मुझसे देखा नहीं जाता। भारत में कई और जगह मैंने यही पंक्ति सुनी, हर जगह भ्रष्टाचार को सहने के लिये, उसे बढ़ावा देने के लिये हर कोई कहता फिर रहा है "चलता है यार"।

मैं भी कई सालों से "चलता है यार" में लिप्त था। मुझे लगता था कि यही हम सबकी नियति है। लेकिन इस बार मैंने प्रण कर लिया है कि "चलता है यार" को नहीं चलने दूंगा। हो सकता है कि मेरी पिटाई हो जाये, जान पर भी खतरा बन सकता है। यदि ऐसा कुछ हुआ तो इसी चिट्ठे पर तस्वीरों सहित पूरी खबर छपेगी। लेकिन मैं "चलता है यार" को नहीं चलने दूंगा।


मुझे क्या चाहिये: चंद लोग जो "चलता है यार" को न चलने दें। हर काम सोच-समझ कर करें। सही काम करें, गलत काम से बचें। इसी को संस्कृत में असतो मा सद्गमय भी कहते हैं।

आइये भारतीय सभ्यता से "चलता है यार" को पूरी तरह मिटाकर फिर से सोने की चिड़िया बनें।

11 टिप्‍पणियां:

jamos jhalla ने कहा…

anil ji aapne jwalant samsaamayik dosh par roshni daali hai.
saadhuvaad.darasal ab waqt aagayaa hai jab chaltaa hai ki vightankaaree pravarti ko sheegr chaltaa kiyaa naanaa jaroori ho gayaa hai.

jamos jhalla ने कहा…

anil ji aapne jwalant samsaamayik dosh par roshni daali hai.
saadhuvaad.darasal ab waqt aagayaa hai jab chaltaa hai ki vightankaaree pravarti ko sheegr chaltaa kiyaa naanaa jaroori ho gayaa hai.

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

कोशिस तो हम भी कर रहें हैं ..पर क्या यह इतना आसान है?

vivek ने कहा…

It is most difficult in India to be conscious, rebel and sane. You'll have to become thick head to survive. Otherwise no one can find even one bone of your body intact. You are a visitor, but we face these things every single day, mutely.

Even if someone tries to raise his voice other people facing the same injustice would say 'kyo faltu me ulajhte ho, chalta hai, jaane do'.

संगीता पुरी ने कहा…

भारत में तो यह सब खुलेआम चलता है .. कोशिश करनी पडेगी इसे समाप्‍त करने की .. यदि इसे फिर से सोने की चिडियां बनानी है .. पर किसी एक से होनेवाला नहीं .. सबों को आगे आना होगा।

अनिल कान्त : ने कहा…

ye kambakht us rishvat ke paison se sharab, shabaab aur kabaab ka intzam karte honge ...aur inke bachche bhi shrab aur shabaab ke liye in rupayon ko udate honge ....seedhi si baat hai sahi ke liye aage aana hi hoga....ab sabke upar hai

नरेश सिह राठौङ ने कहा…

पैसा देकर काम बन जाये तो गनीमत सम्झिये साहब यहाँ तो कई बार पैसे कि मांग भी अप्रत्यक्ष रूप से की जाती है । जिससे काम भी रूका हुआ पडा रहता है । मै पहले गुजरात के सुरत शहर मे रहता था जहा यह सब खुलेआम चलता है । इस लिये वहा विकास कार्य भी चलता है । लेकिन अभी राजस्थान मे रहता हू तो यहाँ पर ना तो लेन देन की बात की जाती है और ना ही विकास ही हो पाता है । मेरा तो यह मानना है कि विकास की गाडी मे रिश्वत का तेल नही दोगे तो वह चलने वाली नही है ।

विश्वनाथ सैनी... ने कहा…

अनिलजी, भारत में रिश्वत लेना कई लोग अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते है. ऐसे में भारत को फिर से सोने की चिडिया बनाने की सोचना शायद बेमानी होगी.

Dr. Munish Raizada ने कहा…

Corruption Perception Index (CPI) 2008 में भारत 85 नंबर पर खडा है (अमेरिका 18, तथा पाकिस्तान 134). भारत में भ्रस्ताचार कूट कूट कर भरा है, तथा हम भारतीय इस से निजात पाने में अपने को असमर्थ पाते है ( ऊपर की टिप्पणियों से भी यही भावना उभर कर आती है). लेकिन यह भी पक्की बात है है की जब तक भ्रस्ताचार का विषाणु हम पाले रखेंगे, विकास की चरम सीमा को नहीं छू पाएंगे. इस का इलाज है: राजनीती में इमानदार लोग आगे बढें, व्यक्तिगत तौर पर लोग अपने कुछ नियम बनाये की उन्हें समाज में किस ढंग का व्यवहार करना है, अपने घर से ही शुरुआत करनी होगी.

Mahesh Sinha ने कहा…

तो आपने किया क्या ? वैसे तो प्रावधान था की आप अपने पासपोर्ट में एंट्री करा कर सामान ला सकते हैं , जाते समय सामान ले जा रहे हैं दिखाना होगा

Anil ने कहा…

लवली कुमारी जी, आसान तो बिलकुल नहीं है। जब तक मैं भारत में था, रिश्वत देना फितरत सी बन चुकी थी। दिल में यह बात पत्थर की लकीर से लिखी जा चुकी थी कि बिना रिश्वत काम नहीं होता। लेकिन अमेरिका आकर देख रहा हूँ कि बिना रिश्वत के भी काम हो सकते हैं - यदि "सिस्टम" ठीक चले तो। अपना सिस्टम गड़बड़ है, इसे ठीक करने के लिये मैं पहला भगत सिंह बनने के लिये तैयार हूँ।

विवेक जी ने भी ठीक कहा, सिस्टम से लड़ना आसान नहीं होता, ऐसा कोई सिरफिरा ही करेगा। तो मैं अपने आपको सिरफिरा घोषित करके सिस्टम से लड़ने का बीड़ा ठान ले रहा हूँ। अगले महीने भारत वापसी है, सब दिखाऊंगा।

महेश सिन्हा जी, आपका सवाल जायज है, "तो आपने किया क्या?" मेरे पिताजी ने कई लोगों से आधी रात फोन करवाये, तब कहीं वह "सज्जन" बीस हजार से उतरकर दस हजार पर आये। मैंने रिश्वत देकर अपना सामान छुड़ाया, क्योंकि १) उस समय मेरे पास चालीस हजार रुपये थे ही नहीं, और २) जो आपने पासपोर्ट की एंट्री कराने वाली बात बतायी है वह मुझे पता नहीं थी।

अब वही "सज्जन" मिलें और रिश्वत माँगकर दिखायें, तो इस बार कुछ अलग होगा।