मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

"आपका पूरा नाम क्या है?"

नामों के मामले में भारत में अजब प्रथायें हैं। नाम से न सिर्फ आप यह बता सकते हैं कि व्यक्ति हिंदू है या मुसलमान, आप यह भी बता सकते हैं कि उसकी जाति क्या है। भारत में हर व्यक्ति की जाति होना जरूरी है। एक बार मैंने एक भारतीय को विदेशियों से भी उनकी "जात" पूछते देखा है।


स्कूल के दिनों मेरे एक सहपाठी का नाम "विनोद" लिखवाया गया था। प्रधानाचार्य से लेकर कक्षा के सभी अध्यापकों ने उसे बार-बार अपना कुलनाम जोड़ने के लिये कहा, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। पचास बच्चों की कक्षा के सामने संविधान के सारे कानूनों को दरकिनार करते हुए एक अध्यापक ने उससे पूछा "तुम क्या हो?", तो उसने बताया "मोची"। ताना कसते हुए अध्यापक ने कहा "तुम तभी अपना गोत्र नहीं लिखते हो।"

ये बातें मेरे बाल-मन पर इतनी गहरी छाप छोड़ गयीं कि बीस साल बाद भी मिटा नहीं पाया हूँ। सारा वाकया आज भी जस-का-तस याद है। बच्चों को शिक्षा देकर समाज-निर्माण करने वाले अध्यापक भी ऐसा करेंगे तो किसी और से क्या उम्मीद हो सकती है?

मेरा कुलनाम "कुमार" है। लेकिन भारत में "कुमार" तो किसी भी आदमी के नाम के पीछे लगाया जा सकता है। अत: मेरे कुलनाम को कोई कुलनाम मानता ही नहीं है। कई लोगों ने पूछा भी है, "आपका गोत्र क्या है" - जहाँ तक मुझे मालूम है, मेरा गोत्र "कुमार" ही है। लेकिन मेरे इस उत्तर से आज तक कोई भी संतुष्ट नहीं दिखा है, उनके चेहरे पर साठ नंबर के फॉण्ट का प्रश्नचिन्ह मेरे उत्तर को दरकिनार करता रहा है।

कुछ समय पूर्व सरकारी कागजों में जाति लिखना गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था। शायद इसीलिये अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में मेडिकल छात्रों की फाइलों में जाति का कॉलम अब नहीं छापा जाता है। लेकिन ध्यान से देखें तो कुछ छात्रों की फाइल के पहले पन्ने पर लाल स्याही से "S.C." लिखकर कानूनों की धज्जियाँ उड़ा दी जाती है।

सन् २००१ में नयी-नयी डॉक्टरी की उपाधि प्राप्त की थी, तो एक संपादक महोदय से पाला पड़ा। उनके निवेदन पर मैंने कुछ चिकित्सा-संबंधी लेख उन्हें लिखकर दिये। उन्होंने छापे भी, लेकिन मेरा नाम "अनिल कुमार शर्मा" कर दिया। पूछने पर उन्होंने कहा कि "अनिल कुमार" अधूरा-सा लग रहा था, सो उन्होंने पूरा बनाने के लिये "शर्मा" कर दिया। दूसरी बार किसी पत्रिका में नाम छपा, तो मुझे "मिश्रा" कर दिया गया। और अब तीसरी बार छपा है, तो मुझे "यादव" बना दिया गया है। मेरा लेख छापने वाले हर पत्रकार-संपादक ने अपना ही गोत्र मेरे नाम के साथ जोड़ दिया है। शायद मेरा बाप बनने की कोशिश तो नहीं?

अब आगे भी न जाने मेरे नाम को "पूरा" बनाने के लिये क्या-क्या जोड़ा जायेगा, भगवान ही मालिक है।

क्या किसी व्यक्ति की काबिलियत या नीयत का पता लगाने के लिये उसका "गोत्र" या "जाति" का पता लगाना बहुत जरूरी है?

24 टिप्‍पणियां:

Anil Pusadkar ने कहा…

हां ये समस्या तो है। सरनेम या गोत्र नही लिखने पर दुनिया भर के सवाल होते है।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बिल्कुल सही है.

कुश ने कहा…

बिलकुल ठीक कहा आपने.. आज भी कई प्रबुद्ध लोग जाति की बात आते ही कन्नी काटने लगते है..

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

आपके जैसी मुसीबत का सामना मैंने भी किया है "कुमारी" लिखकर..पर क्या करें आदत है की छूटती नही .

"मुकुल:प्रस्तोता:बावरे फकीरा " ने कहा…

Bhaiya
badi paini nazar hai

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

आदमी का नाम नहीं..नंबर होना चाहिए.
शायद हम तो भी बाज न आयें:-
५२५ शर्मा,
२१३ सिद्दीकी...

डॉ .अनुराग ने कहा…

वैसे कौन जात हो भाई ?

नरेश सिह राठौङ ने कहा…

आपकी बहुत सी बाते कुछ सोचने को मजबूर करती है । आपकी बातो पर हा भरे यह जरूरी नही है । मै आपकी इस बात से कतई सहमत नही हू कि अपनी जाती को छुपाया जाये । मै तो यह मानता हू कि जाती पर गर्व करना चाहिये । अगर जाती को छुपाया जाता है तो इसका मतलब है कि आप अपने आप पर भी गर्व नही करते है । आप अपने से जुडी हरेक चीज से गर्व करे । भले ही जाती हो या नाम हो ।

mark rai ने कहा…

mujhe isame kuchh galat nahi lagta..agar aap gotr yaa jati shabd suchak ka pryog karte hai to yah aapka personal maamla hai ..
agar koi aadmi nahi karta hai to yah usaka personal maamla hai ..
waise jaati vywstha samaaj me ek buraai hai ...kisi bhi aadmi ko jaati bataane ke liye baadhy nahi karna chaahiye ...
aaj aadhunik yug me jaati vywstha tutne ke kagaar par hai ...
par agar koi jaati vywsthaa banaye rakhna chaahta hai aur uska najayaj faayada nahi uthaata yaa usaki aisi koi mansa nahi hai to mujhe nahi lagta ki isamr kuchh kharaabi hai ....waise bhi hamaare samaaj ki pahchaan jaati se hi judi hui hai ..khatm hone me samay lagega ..

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

पहले कहा जाता था :- जात न पुछो साधु की, पुछ लीजिओ ज्ञान........
पर अब तो :- जात बता दो आपनी, बनवा लो सारे काम।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

आपकी बात कुछ हद तक तो सही है..जातिप्रथा का मैं भी पक्षधर नहीं हूं. किन्तु अक्सर ये भी देखने में आता है कि अगर कोई व्यक्ति SC/BC से संबंधित है तो सामाजिक,व्यवहारिक जीवन में वो अपनी जाति/गोत्र को छुपाने का प्रयास करता है,लेकिन जब किसी विशेष सुविधा (आरक्षण इत्यादि)प्राप्ति का अवसर मिलता है तो अपनी जाति/गोत्र को लेकर जो हीनता उसके मन में है, वो तुरन्त समाप्त हो जाती है.

Dr. Munish Raizada ने कहा…

यह बहुत प्रासंगिक मुद्दा उठाया आपने. जाती का महत्व कम हो, इस के लिए:
1. कुछ सामान्य सरनेम/surname (आखिरी नाम) प्रयोग किया जाये: कुमार, स्वामी, योगी, दास, चन्द्र, सिंह, इत्यादि
2. मैं इस का प्रबल पक्षधर हूँ जब लोगों को आखिरी नाम दूसरों से "चुरा" कर लिखते देखता हूँ, जैसे एक हरिजन अपने नाम के पीछे पंडित लगा लेता है. या कोई दलित व्यक्ति गुप्ता लिखने लग जाये. मैं दलित-सवर्ण की डिविजन के सख्त खिलाफ हूँ, यहाँ बात समझाने के लिए लिख रहा हूँ. सरनेम या आखिरी नाम का इतना उल्ट- पुलट हो जाये की इनका महत्व ही समाप्त हो जाये, यही एक कारगर इलाज है.
3.Inter-caste विवाह को बढावा मिले.
4. और, जाती के आधार पर आरकक्षण जितन जल्दी phase out कर दिया जाये, उतना ही भारतीय समाज का भला होगा. आज के युग में दो भाइयों ( पढें: हिन्दू व् भारतीय) को लड़वाना है तो आरक्षण जारी रखिये.

Mahesh Sinha ने कहा…

अनिल जी मैंने इस बारे में अपने कुछ विचार लवली कुमारी जी के ब्लॉग में जहाँ उन्होंने अपने नाम के बारे में चर्चा की है, रखे हैं . नाम में माने तो बहुत कुछ है और नहीं तो कुछ भी नहीं
यहाँ मैं एक अन्य बात रखना चाहूँगा, पहला तो ये मेरे शायद उपनाम से भ्रमित होकर मुझे एक बंगाली नेटवर्क ज्वाइन करने का निमंत्रण आ गया :)
दूसरा एक बहुत बड़ा षडयंत्र चल रहा है इस देश में, लोग अपना धर्म तो बदल लेते हैं लेकिन नाम नहीं बदलते . दोनों हाथों में लड्डू , एक तरफ पैसा या सुविधा लो धर्म बदलने के लिए और दूसरी और आरक्षण का भी लाभ लो ?

अनिल कान्त : ने कहा…

करीब ८-१० साल पहले में मैनपुरी (उत्तर प्रदेश ) के एक गाँव में अपने किसी जानकर की बारात में गया था ...उस गाँव में हरिजन/ दलित या सवर्णों की भाषा में बोले तो चमार ...क्योंकि दलित शब्द का यही मतलब उन्हें समझ आता है .... तो उस गाँव में रिकॉर्ड था की किसी चमार की बारात गाँव में नहीं चढ़ती थी ...वो यादवों का गढ़ था ....और कुछ ब्राहमण और ठाकुर भी थे .....अगर कोई बारात चढाने की कोशिश करता तो ...वो दूल्हे और बारातियों की पिटाई कर देते ...पूरे गाँव के लोग मिलकर ....डरकर कोई दलित बारात गाँव से न चढाता ...वो बस अपने घर के सामने थोडा ...गाना वाना कर लेता ....

जब ये बारात गयी तो ....हमारे पिताजी ...जो की पुलिस में हैं ...उन्होंने वहां के हालातों को मद्देनज़र रखते हुए ....वहां के एस.पी. साहब से कह ४-५ पुलिस वालों को साथ ले लिए .....जब बारात चढ़ रही थी ...तो कुछ उच्च जाती के लोग बोलने लगे ...कि अकिसे उछल रहे हो ....हमाल बाते दियें .....और जबरजस्ती लड़ाई लड़ने लगे ....बोले कि अबई मायावती कुर्सी पे नायि बैठी ...जो तुम्हें बचाई लिए .....मतलब सीधी लड़ाई .....४-६ लौंडो कट्टा और बन्दूक लेकर आ गए .....वो तो भला हो कि ४-५ पुलिस वाले साथ थे ..तो मामला रफा दफा किया ...और जैसे तैसे बारात चढी .....

जब पुलिस के रहते वो ये सब कर सकते हैं ..तो सोच सकते हैं कि औरों के साथ क्या करते होंगे ...सोच कर भी हैरानी होती है

और ज्यादातर लोग अपनी जाती इसलिए छुपाते हैं कि कुछ दफ्तरों में जाति के नाम पर बदसलूकी , शोषण होता आया है ..... अपनी जाति के लोगों के लोग पक्षधर रहे हैं .....तो कुछ दलित ये सोच छुपाते हैं और डर कर रहते हैं कि पता चलने पर न जाने कैसा व्यवहार करेंगे ....

और अगर आरक्षण कि व्यवस्था ना की गयी होती ...तो उच्च वर्ण के लोग उन्हें कभी मौका न देते आगे बढ़ने का ...या जमीनी हकीकत थी उस वक़्त की ...बातें चाहे जो भी कर ले ...ये आरक्षण और लड़ते रहने का ही सिलसिला है कि दलित आगे बढ़ सके ...वरना किसको पड़ी थी ...जो सड रहे हैं ...दबे कुचले हैं ..रहने दो ...मरने दो ...हमारी बला से ...ये हालत रहे हैं ..और ये किसी से छुपे नहीं हैं

Mahesh Sinha ने कहा…

जहां तक अन्य धर्मों का सवाल है तो दुनिया के हर धर्म या धर्महीन समाजों में भी विभेद है .
इनमे हिन्दू धर्म के मानने वाले सबसे कम कट्टरपंथी हैं आज की स्थिति में
मायावती जो कुछ जातियों को गाली देते रहती थी जब उनको भी उन्होंने अपने साथ शामिल किया तो आज देश के सबसे ज्यादा जनसँख्या वाले राज्य में बिना किसी अन्य पार्टी के अकेले शासन कर रही हैं.
गोत्र की भी जो व्यवस्था है वो ऋषि मुनियों के नाम से है इसका एक वैज्ञानिक पक्ष भी है . समान गोत्र के लोगों के बीच विवाह नहीं होना चाहिए, (consagnious marriage ). जिससे आने वाली पीढियां आनुवंशिक दोषों से बची रहती हैं .

Udan Tashtari ने कहा…

बिल्कुल सही कह रहे हो..हमारा लास्ट नेम ’लाल’ भी अक्सर प्रश्न उठवाता है. :)

यूनुस ने कहा…

हम तो इसी मुद्दे से जूझ रहे हैं अपने बेटे के मामले में । उसका 'सरनेम' नहीं रखने के बाद सवालों के दायरे बढ़ रहे हैं । पर हम अडिग हैं ।

janane_ka_hak ने कहा…

anil ji.. kafi log pahal kar rahe hain... main b apne nam k aage se apna surname bhardwaj hata chuka hu... abi kuch hi din pahle apne ek sharma teacher ko is bat par fatkar chuka hu ki.. use ye pata chal gaya ki main brahmin hu... aur 2 sal bad achanak unka apanatv jag gaya...

badlav ho rahe hain bas waqt lagega...

Everymatter ने कहा…

bahut sahi likha hai aapna

kverma ने कहा…

अनिल जी ,मै आपकी बात से इतेफाक करता भी और नहीं भी ,लेकिन आपने समाज की जातिनीति जो चल रही है उसमे कुछ लोगों ,जिनकी सुपोर्ट में इस समय हम सब लिख रहे हैं ,ठीक लगता है ,लेकिन कुछ लोगों ने आपने नाम एवम जाति को एक हथियार के रूप में ,समाज ,सरकार एवम संस्थाओं के ऊपर करते हैं ,शायद परबुधवर्ग इस आशय को अच्छी तरह समझ रहा होगा,..

meribhisuno ने कहा…

anil ji achha likhte ho aur likha bhi badhiya hai ,dhanywad.

anitakumar ने कहा…

आप तो जाती की बात कर रहे हैं, मेरा नाम देख कर तो लोग मेरे नारी होने पर भी शक करने लगते हैं। लड़की हो कर कुमार कैसे हो सकती है वो तो कुमारी होना चाहिए। हम मुस्कुरा कर रह जाते हैं क्युं कि कुमार उपनाम भी हमारा खुद का चुना हुआ है सिर्फ़ इस लिए कि मेरे उत्तर भारतीय रिश्तेदार मेरे दक्षिण भारतीय पति का उपनाम ठीक से बोल ही नहीं सकते थे। तो चलो सबकी मुश्किलें आसान कर दीं और कुमार तो पूरे देश में कहीं भी फ़िट हो जाता है।
वैसे जाती पूछने का प्रचलन रिसर्वेशन पोलिसी के बाद ज्यादा हुआ है

Unknown ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
बेनामी ने कहा…

chaliye maan loo jatigat arkshan khat ho gaya . ab sc/st ke logo ko jabarjasti nalayak or not qualified kiya jayega. kyoki select karne wale upper caste ke honge. o kabhi bhi select nahi karege. nispachh bharti kaise hogi?



pawan kumar