रविवार, 27 जुलाई 2008

एक अकेला चना जिसने भाड़ फोड़ा - २: मोहनदास से महात्मा क्यों बने?


मोहनदास गाँधी को ऐसी क्या आफत आन पड़ी थी जो उन्होनें महात्मा गाँधी बनने का निश्चय कर लिया? ऐसा क्या हो गया जो उन्होनें ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने का फ़ैसला किया? बैरिस्टर थे, पेट भरने लायक कमा लेते थे, विदेश में जाकर वकालत की अच्छी प्रैक्टिस जमा रखी थी। आख़िर क्यों किया उन्होनें ये सब?

इसका जवाब जानने के लिए हमें उनकी जिंदगी के कुछ अनुभवों पर ध्यान देना होगा। आइये सुनते हैं।

दक्षिण अफ्रीका में जाते ही उन्हें पहली ही ट्रेन से निकाल बहार फेंका गया। पहले दर्जे का टिकेट होने के बावजूद उन्हें तीसरे दर्जे में बिठाया गया क्योंकि वे गोरे नहीं थे। ट्रेन से उतर कर बस पकड़ी। भीड़ होने की वजह से दरवाज़े पर खड़े थे। एक गोरे को बस में चढ़ने में इसी वजह से थोड़ी सी दिक्कत हो गई। बस ड्राईवर ने आकर मोहनदास के कान पर कसकर तमाचा जड़ दिया। होटल पहुँचने पर उनको कमरा नहीं दिया गया हालाँकि मोहनदास पैसे देने को तैयार थे। गोरे न होने की वजह से उनको बहार ही रात गुजारनी पड़ी। पहले ही दिन इतना कुछ हुआ उनके साथ दक्षिण अफ्रीका में।

अगले कुछ दिनों में मोहनदास होते-होते कोर्ट पहुँच ही गए अपने पहले मुकद्दमे की पैरवी करने। जज ने पगड़ी उतारने को कहा, मोहनदास ने साफ़ मना कर दिया। ऐसे कैसे पगड़ी उतरवा लोगे? कोर्ट से बाहर निकाल फेंका गया मोहनदास को।

मोहनदास ने देखा कि हर भारतीय के साथ कुत्ते से भी बदतर सलूक किया जा रहा था।

वे यह भी सोच सकते थे: "कुछ नहीं होता यार, पैसे तो मिल ही रहे हैं "। लेकिन वे यदि ऐसा करते तो मोहनदास गाँधी ही रह जाते, महात्मा न बन पाते उन्होंने सोचा "मेरा स्वाभिमान मेरे लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है, और मैं इसपर लगी ठेस को मिटा कर ही रहूँगा"।

न सिर्फ़ अपनी, बल्कि करोड़ों भारतीयों की ठेस मिटाई उन्होनें। तभी बन गए मोहनदास से महात्मा।

ये तो इतिहास था। अब वर्तमान भी देखिये। जैसा बर्ताव अँगरेज़ सभी भारतीयों से करते थे, वैसा आजकल हम लोग आपस में ही करने लगे हैं एक-दूसरे से। हिंदू मुसलमान को जला रहा है, मुस्लमान हिंदू के घर में बम फोड़ रहा है। ब्राह्मण दलित को मार रहा है, दलित ब्राह्मण को तोड़ने का सपना संजोये बैठा है। अरबपति होने के बावजूद भाई-भाई आपस में लड़ रहे हैं। श्रेष्ठ राजनेता अपने ही भाई की पत्नी से संबंधों के कारण भाई के हाथों मारे जा रहे हैं। संसद में जो कुछ हुआ पिछले हफ्ते, वह किसी अश्लील चलचित्र से कम नहीं है। और आजकल आतंकवादियों द्वारा भारत देश में दिवाली मनाई जा रही है, बस पटाखे थोड़े से बड़े हो गए हैं।

अपने पिछले चिट्ठे में मैंने ये सवाल पूछा था आपसे, कि कौन फोड़ेगा इस भाड़ को? क्या आप फोड़ेंगे? कैसे फोड़ेंगे?

क्या आपको लगता है कि आजकल भारत में वाकई अन्याय हो रहा है? क्या आप इस अन्याय को मिटाने के लिए महात्मा बनना चाहेंगे? आपका नाम क्या है? अपने नाम के आगे महात्मा लगा कर देखिये, कैसा लगता है? कैसे बनेंगे आप महात्मा? कब से शुरू कर रहे हैं आप सत्य के लिए आग्रह?

मैंने आज शुरू कर दिया है। धीरे-धीरे पूरा खाका उजागर करूंगा।

ये खादी पहने लोग जो संसद में बैठते हैं, इनको मैं एक दिन धूल चटाकर ही दम लूँगा।

ये मेरा वादा है।

एक अकेला चना जिसने भाड़ फोड़ा: भाग १ | भाग २| भाग ३| भाग 4

3 टिप्‍पणियां:

संजय तिवारी ने कहा…

बहुत गुस्सा हो भाई. ब्लाग लेखन करके धूल चटाने की मंशा थोड़ी बड़ी है. आप कुछ और कर रहे हों तो और बात है.

Anil ने कहा…

संजय जी, अभी तो सिर्फ चिट्ठे लिख रहा हूं। थोड़ा समय दे दीजिये, भारत वापस आते ही काम शुरू हो जायेगा। आज देश बहुत ही नाजुक हालत में है, और अपने ही शासकों से अपेक्षा रखना गलत है। हर व्यक्ति को "कोई बात नहीं यार, चलता है" कहना छोड़ कर अपने समाधान खुद ढूंढने होंगे।

Dr. Munish Raizada ने कहा…

अनिल भाई: २७ जुलाई २००८ का यह आपका कमेन्ट देखा, ( अभी तो सिर्फ चिट्ठे लिख रहा हूं। थोड़ा समय दे दीजिये, भारत वापस आते ही काम शुरू हो जायेगा। आज देश बहुत ही नाजुक हालत में है, और अपने ही शासकों से अपेक्षा रखना गलत है। हर व्यक्ति को "कोई बात नहीं यार, चलता है" कहना छोड़ कर अपने समाधान खुद ढूंढने होंगे) . साथ ही गाँधी जी के महात्मा बनने का आपका विवरण .
कहाँ हो भाई! लगता है गाड्डी इकठे चलाई जा सकती है. कृपया www.mifindia.org देखें तथा संपर्क करें:pedia333@gmail.com