मंगलवार, 29 जुलाई 2008

चिट्ठाकारों के दोहे - १

जी में एक जिज्ञासा थी, का होवत है ब्लाग ।
लिखना जो शुरू किया, तो बन निकले हम घाघ ॥

रात थिरकती उँगलियाँ, चिट्ठा लेखन को आतुर ।
सबने चिट्ठा लिख लियो, होगये मुझसे चातुर ॥

निंदिया न आवे मोहे माँ, चिट्ठा न पूरा हुवत ।
थोड़ा सा लेखन दवे, ह्रदय न बहुत रोवत ॥

चिट्ठा बांचन जो लगे, करे काम न धाम ।
सारा समय निकल गयो, होया काम तमाम ॥

काल लिखे सो आज लिख, आज लिखे सो अब ।
पल में नेट जो कट गया, बहुरि लिखेगा कब ॥

लिक्खाड़ों की दौड़ में, जा कोई कूद पड़त ।
बीबी बच्चा छोड़िये, कंप्यूटर संगही मरत ॥

ठोर निठल्ला बैठ गयो, मो न करत कोई काम ।
वह चिट्ठा में बस गयो, मेरो चारों धाम ॥

चिट्ठा-चिट्ठा मोहे तू, अब अपनी सरन में ले लै ।
अब तेरी ही गोद में, मेरा जीवन खेलै


यहाँ पढिये चिट्ठाकारों के दोहे भाग

5 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

अनिल जी,बहुत बढिया दोहे लिखे हैं।सभी एक से बढ कर एक हैं।पढ़ कर मजा आ गया।यह दोहा सबसे ज्यादा पसंद आया-

काल लिखे सो आज लिख, आज लिखे सो अब ।
पल में नेट जो कट गया, बहुरि लिखेगा कब ॥

राज भाटिय़ा ने कहा…

अनिल जी ,आप को आज से भगत अनिल जी कहना शुरु करते हे, क्या चुन चुन के दोहे लाये हे, एक छुट गया था सोचा आप को सोपं दु, धन्यवाद
लुट सके तो लुट ले, टिपण्णी नाम की लुट.
फ़िर पाछे पछतायेगा जब, लेख जायेगा छुट.

Anil ने कहा…

राज जी और परमजीत जी, धन्यवाद. कल बैठे-बैठे मैंने यूँ ही कुछ दोहे लिख दिए थे, आपका आभार उन्हें पसंद करने के लिए. आज शाम को पाँच-छह और लिखूंगा, देखते हैं कि क्या निकलता है!

ओमप्रकाश तिवारी ने कहा…

मजा आ गया।

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

Vah Bhai, Dohe kamal ke hai.