शनिवार, 19 जुलाई 2008

जो अपने मां-बाप को सही सलाह न दे पाया, वो मुझे क्या देगा


मैं एक छात्र हूं जो अमेरिका आया हुआ हूं पढ़ाई के लिये। आजकल मेरे साथ रहने एक भारतीय सज्जन आये हुए हैं। उन्होनें प्राइवेट मेडिकल कॉलेज से डाक्टरी की है। अब वो अमेरिका में आकर यहाँ के मरीजों की सेवा करना चाहते हैं। मुझसे बातचीत के दौरान उन्होनें अपने विचार खुलकर प्रकट किए कुछ इस तरह:

मैं: तो तुम अमेरिका में डाक्टरी सीखने के बाद क्या करोगे?
वह: यहीं पर अपनी प्रैक्टिस जमाऊंगा।

मैं: तो तुम्हारे मां-बाप?
वह: वो इंडिया में ही रहेंगे। मैंने उन्हें सुझाव दिया है कि वहां भी तो होना चाहिये ना कोई देखरेख के लिये।

मैं: किस बात की देखरेख?
वह: वहां पर हमारी ज़मीन-जायदाद की, और किसकी?

मैं: तो तुम भारत वापस नहीं जाओगे?
वह: तुम भी कैसी ऊट-पटांग बातें करते हो। अमेरिका में आने के बाद भला कोई भारत वापस जाना चाहेगा?

मैं: क्यों यार, भारत इतना भी तो बुरा नहीं है। लोकतंत्र में बुराइयां हैं वहां, लेकिन लोग तो अच्छे हैं।
वह: यार अच्छे लोगों से तुम अपना पेट भरोगे क्या? पेट तो सिर्फ़ पैसे से भरता है, और पैसा सिर्फ़ अमेरिका में है।

मैं: ये १० साल पहले की बात है। आजकल हिंदुस्तान में भी गगनचुम्बी इमारतें बन रही हैं, सैकडों करोड़पति और अरबपति बन रहे हैं वहाँ पर। खूब बढोतरी हो रही है।
वह: नो मैन, युनाइटेड स्टेट्स इज द बेस्ट। आई विल नेवर गो बैक टू इंडिया।

मैं: ऐसा मत कहो यार, इंडिया इज योर कंट्री।
वह: कंट्री-वंत्री गया तेल लेने। जहाँ पर मुझे कंफर्टेबल लगेगा वहीं रहूंगा मैं। तुम्हें अगर भारत इतना पसंद है तो तुम क्यों नहीं चले जाते वापस?

मैं: मेरा तो यही प्लान है। अमेरिका में ३ साल की डाक्टरी करने के बाद २ साल प्रैक्टिस करूंगा ताकि अपने सर पर चढ़ा कर्ज़ उतार सकूं। फिर उसके बाद वापस!
वह: तुम चैंपियन है यार, तुम चैंपियन है। तुम्हारा दमाग ख़राब हो गया है। पढ़ लिखकर सभी लोग आगे बढ़ना चाहते हैं लेकिन तुम वापस मिट्टी में जाना चाहते हो। इंडिया में भी गांव के लोगां शहर जा रहे हैं क्योंकि वे वहां पर ज्यादा कंफर्टेबल महसूस करेंगे। और एक तुम हो नमूने कहीं के।

मैं: मुझे लगता है हमारे विचारों में काफी मतभेद है। चलो यहीं पर इस बात को ख़त्म करते हैं।
वह: तुम्हारा एक दोस्त होने के नाते मैं तुम्हें बार बार यही कहूंगा कि यहीं रहो, कोई ज़रूरत नहीं है इंडिया-विंडिया वापस जाने की। आगे तुम्हारी मर्ज़ी।

अगला वाक्य में कहना चाहता था, लेकिन कह न पाया: "जो अपने मां-बाप को सही सलाह न दे पाया, वो मुझे क्या देगा?"

15 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ल ने कहा…

सही है। अपने इरादे पर कायम रहना!

Neeraj Rohilla ने कहा…

शानदार,
बिल्कुल सही कहा आपने, हमसे पिछली पीढी जो अमेरिका आयी थी उनके पास बहाना था कि भारत में उतने अवसर नहीं हैं । आज भारत में इतने अवसर हैं कि सभी कम्पनियाँ भारत भाग रही हैं, ऐसे में ये बहाना नहीं चलने वाला कि भारत में अवसर नहीं हैं ।

मेरे एक मित्र ने अभी पिछले हफ़्ते ही भारत में नौकरी पक्की की हैं । ६-७ महीने में उनकी पीएचडी खत्म और वो भारत रवाना ।

ab inconvenienti ने कहा…

मेरे भी विचार आपके मित्र जैसे हैं, भारत मुझे प्यारा है, यहाँ अवसर भी हैं पर लिविंग स्पेस की भारी कमी है. हम सौ के लिए रोटी-स्कूल जुटा पाते हैं पर उससे पहले ही हज़ार भूखे-नंगे और बढ़ जाते हैं. साल में दो-तीन दंगे आम बात हैं, ग़लत बात का विरोध करो तो तुम्हारी लाश का भी पता नहीं चलेगा. कोई भी किसी भी बात पर अर्थव्यवस्था को बंधक बना लेता है, अनपढ़ गंवार पढ़े-लिखों पर राज कर रहे हैं. गांवों में न टेक्नीशियन हैं, न बेड, न टेलीफोन-बिजली, न दवाईयां, न टेस्टिंग किट.......... और नियम बना दिया जाता है की हर मेडिकल ग्रेजुएट को अपनी प्रेक्टिस का पहला वर्ष किसी पिछडे गाँव में बिताना पड़ेगा. किसी भारतीय पोर्टल पर देख लो की नेता किस भाव बिक रहे हैं. और वहां चीन हमें रोज़ तमाचे जड़ देता है, हम अपना सा मुंह ले कर रह जाते हैं. :-(

आकार तुम भी कितनी समाज सेवा कर पाते हो देखते हैं, मैं भी चाहता हूँ की देश सुधरे. पर इसका रास्ता राजनीती से होकर जाता है, जो अपराधियों बाहुबलियों और गेंगस्टरस से लबालब है. एंट्री काफी मुश्किल है, और इनके साथ काम करना और भी मुश्किल, ऊपर से ब्यूरोक्रेसी भी महाभ्रष्ट! और फ़िर जीवन के इतने साल किताबों के बीच इन अनपढों के बीच कुंठित होने के लिए, या फालतू में जान गंवाने तो नहीं बिताये.

हम यहाँ सच्चाई से रोज़ रू-ब-रु होते हैं, और मजबूरी को महसूस करते हैं.

दूर से घास हरी दिखती है, और एन आर आई हम रेसिडेंट भारतियों से हज़ार गुना ज़्यादा इंडियन होते हैं(तभी कारण जौहरों, शाहरुखों जैसों पर नोट लुटते हैं) . मुझे भी घास के हरी होने की हकीकत मालूम है पर वेस्ट-इंडीज़ या ऑस्ट्रेलिया में कम से कम इतनी भीड़ और chaos तो नहीं होगा........ उम्मीद तो यही है, वरना हम भारतीय तो हैं ही.

Anil ने कहा…

ab inconvenienti साहब, आपके तर्क दुरुस्त हैं। टिप्पणी के लिये तहेदिल से शुक्रिया! आपका लिखा सुनकर एक पल के लिये मुझे शहाबुद्दीन और दूसरे पल दाऊद इब्राहीम का ध्यान अचानक से आ गया था।

अब तनिक इधर भी सुनिये: "क्या आपकी मां बीमार पड़ जाये तो उसे घर से बाहर निकाल देंगे?" सुनने में कुछ अजीब सा लगेगा, लेकिन मैं अपने देश को अपनी मां ही मानता हूं। आज मैं जो कुछ भी हूं, उसमें देश का बहुत बड़ा योगदान है। मेरा फ़र्ज़ बनता है अपने मातारूपी देश की सेवा करना। हक भी बनता है।

रही बात अन्याय की, तो मेरे भाई अन्याय तो हर जगह हो रहा है आजकल। अमेरिका में भी। कहां-कहां से भागूंगा?

अन्याय करना एक पाप है। उसे सहना भी एक पाप है। भारत में वापस आकर यदि मुझे अन्याय दिखेगा, तो उसके प्रति अपनी आवाज़ उठाना मेरा कर्तव्य है - यही मैंने आज तक किया है, और आगे भी करता रहूंगा।

चीन कैसे हमारे देश को तमाचे जड़ता आ रहा है? वो भी तो अविकसित देश है। फिर कैसे वे लोग हमें दुत्कारते रहते हैं? क्योंकि उनके लोग अपने आप पर विश्वास रखते हैं। मेरे लैब में ७ चीनी हैं, सातों से पूछकर देखिये क्या राय है उनकी अपने देश के बारे में। और हिंदुस्तान के लोगों की मनोस्थिति तो आपने बखूबी बयां कर ही दी है अपनी टिप्पणी में। यही एकमात्र अंतर है दमदार और दब्बू देशों में।

और मैं भारत में "अवसरों" की वजह से वापस नहीं आ रहा हूं। जब मैं छोटा था, ब्लाग-व्लाग नहीं होते थे, बल्कि मैं एक छोटी सी हरी डायरी में अपने विचार लिखा करता था। करीबन २० साल पहले मैंने लिखा था "काम करो तो अपने देश के लिये। उसके बाद किसी और के लिये"। चाहे कोई मुझे पगला कहे या सिरफिरा, मैं आज भी वही धारणा रखता हूं।

अवसर न हों तो "बनाये" जा सकते हैं। लेकिन चौकी छोड़कर भागना मेरी फितरत में नहीं।

लाश बिछे तो बिछ जाये। लेकिन कुढ़ कर मैं न कभी रहा हूं, और न कभी रहूंगा।

ab inconvenienti ने कहा…

आपकी एक-दो पूर्व पोस्ट भी तो मेडिकल छात्रों की समस्या पर थी............... क्या आप गांवों में फ़िर भी जाना चाहेंगे? प्रेक्टिकल हुए तो भारत आकर भी शहर में ही प्रेक्टिस जमायेंगे........... वरना जिंदगी किसी न किसी मोड़ पर हमारे सर से आदर्शवाद का भूत उतार देती है.

Anil ने कहा…

गांवों में जाना मेरा एक सपना है। मानता हूं बहुत मजबूरियां हैं, काफी कमियां हैं। लेकिन मुझसे मेरा सपना तो न छीनिये। जो लोग सपने देखते हैं, वो कभी कभी उसे अंजाम भी दे देते हैं। लेकिन जो सपने ही नहीं देखते, वे कभी वह काम नहीं कर पाते।

दिल में हौसला है, अगर गांव जाकर सेवा करने का मौका मिला तो ज़रूर जायेंगे। जो समस्याऐं हैं वहां, उनका निदान भी सोचना शुरू कर चुका हूं। उसी हरी डायरी में लिख भी रहा हूं। नहीं जानता कि कर पाऊंगा कि नहीं, लेकिन कम से कम कोशिश तो ज़रूर करूंगा।

रही बात आदर्शों की - तो वे दो प्रकार के होते हैं। एक अपने बनाये हुए, और एक दूसरों के बनाये हुए। मैं दूसरों की सुनता हूं, लेकिन करता वही हूं जो अपने दिल से आवाज़ आती है। मैं इसे आदर्श नहीं, इच्छा मानता हूं।

ab inconvenienti ने कहा…

सपने को छीनने की कोशिश के लिए क्षमा याचना सहित........... आपकी हिम्मत और मन में संजोये सपनों के लिए शुभकामनाएं. सपने कोई छीन नहीं सकता यह पोस्ट पढिये

Anil ने कहा…

ab inconvenienti साहेब, शुक्रिया आपकी शुभकामनाओं के लिये और उस कहानी के लिये। ये भी देखें: http://in.youtube.com/watch?v=dc4UltkRJsw

Rachna Singh ने कहा…

anil
a nice post which in less says more for those who want to understand .

Suresh Chandra Gupta ने कहा…

बहुत सही बात कहा आपने - "जो अपने मां-बाप को सही सलाह न दे पाया, वो मुझे क्या देगा?" जिस देश की मिटटी में खेल कर इस जगह पहुंचे. जिस देश का पानी पीकर, हवा अपने फेफड़ों में लेकर आज किसी लायक बने, उसी देश से भागना, गद्दारी है.

राज भाटिय़ा ने कहा…

अनिल भाई हम दुनिया मे कही भी रहे, हमारा दिल, दिमाग तो हमेशा भारतीय रहे गा,हमारी पहचान भारत हे,मे मानता हु हमारे देश मे काफ़ी कुछ गलत हो रहा हे, लेकिन इस सब बातो से अपने देश को बुरा कहना गलत हे,यह कमिया हमे खुद को दुर करनी हे,लेकिन शुरु आत दुसरा करे यह गलत हे, शुरु आत भी हमे करनी हे, हम चले, जिस ने पीछे आना हे आये ...
बहुत अच्छा लेख लिखा हे आप ने धन्यवाद

Mired Mirage ने कहा…

आपकी भावनाओं के बारे में पढ़कर खुशी हुई। एक तरीका सपना साकार करने का यह भी है कि कुछ साल वहाँ काम करो और कमाओ और लौटकर किसी गाँव में बढ़िया सा हस्पताल बनाओ। ताकि आसपास के गाँवों को भी सुविधा हो। शुभकामाओं सहित,
घुघूती बासूती

Udan Tashtari ने कहा…

उम्दा विचार हैं. कायम रहिये..बहुत शुभकामनाऐं.

गरिमा ने कहा…

आपका इरादा बहुत अच्छा है, और इसका समर्थन होना ही चाहिये, जो पौधा अपने जड की अवहेलना करता है, वो सूख जाता है, लोग पैसे तो कमा लेते हैं, पर अपनो के साथ के बिना जीना भी कोई जीना है।

Anil Pusadkar ने कहा…

bahut badhiya anil jee.gaon aaj taras rahe hain sirf aache docter ke liye nahi balki achhe logo ke liye bhi.main bhi bharat ke gaon ko dum todte dekh raha hun dhire dhire.umeed hai aap jaise log use zinda rakhenge.ek post gaon ke wridhaashram me badlne par maine bhi likhi hai,waqt mile to us par zaroor nazar daliyega