मंगलवार, 8 जुलाई 2008

औरकुट के चिरकुट

मैं अपने दोस्तों से संपर्क रखने के लिये जी-मेल पर निर्भर करता हूं क्योंकि ये मुफ्त है और बहुत सारी सुविधायें देती है जो आम ई-मेल में नहीं मिलती हैं। कुछ साल-एक पहले गूगल ने जीमेल और औरकुट को एक पुलिंदे में बांध दिया। मेरे औरकुट के दोस्त अपने आप ही जी-मेल चैट में आकर मुझसे बतियाने लगे।

मैंने फिर एक नयी घटना देखी - काफी सारे लोग औरकुट में अपना नाम कुछ इस तरह से लिखने लगे -

Bhola Prasad is OFF ORKUT till 2nd July
Chakra Dhar DO NOT MESSAGE ON ORKUT
Bhima Gupta NO ORKUTTING till 4th August

मुझे ये कुछ समझ में नहीं आया - भाई औरकुट तो सिर्फ एक वेबसाइट है - इसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है जो तुम इससे बचने की कोशिश कर रहे हो?

फिर देखा-देखी काफी सारे और भी मित्र कुछ इसी तरह के नाम रखने लगे, जैसे कि औरकुट ना हुआ, हिटलर हो गया - "इससे बच कर रहो"! पहले तो मैं कई दिनों तक इस उत्सुकता को दिल में "पार्क" किये रहा, लेकिन फिर एक दिन तो हद ही हो गयी - साले ५ दोस्त जीमेल पर मौजूद हैं, और पांचों के पांचों औरकुट-विरोधी नाम धारण किये हुये हैं। मेरी सब्र का बांध बस जैसे टूटने के लिये इसी घड़ी का इंतज़ार कर रहा था। एक पल तो पूछते हुये लगा कि शर्म आयेगी, क्योंकि अकसर लोग मुझसे तकनीकी विषयों पर परामर्श लिया करते हैं, लेकिन आज तो गंगा उलटी ही बह निकलेगी। लेकिन फिर मुझे एक कहावत याद आयी - "जो सवाल नहीं पूछता, वो कभी कुछ सीख भी नहीं सकता"।

मैंने आखिरकार पूछ ही लिया - "यार ये तुम लोग औरकुट से दूर क्यों जाना चाहते हो?"

जवाब आया - "यार मेरा एग्जाम है"

मैं बोला - "एग्जाम है तो औरकुट तुम्हारा क्या बिगाड़ लेगा?"

जवाब आया - "टाईम वेस्ट होता है यार"

मैंने कहा - "यार ये बात तो कुछ हज़म नहीं हुई - औरकुट पे तो मैं भी जाता हूं, लेकिन १ महीने में शायद १० मिनट से ऊपर कभी समय व्यतीत नहीं किया होगा मैंने औरकुट पर"

ये सुनते ही मेरे मित्र की भवें जैसे सिगमौइड कर्व की तरह टेढ़ी हो गयीं - "तो तुम्हें क्या कभी औरकुट एडिक्शन नहीं हुआ?"

मैंने भीगी बिल्ली की तरह शरमाते हुये जवाब दिया - "नहीं तो!"

धत् तेरे की - मैं भी कैसा मूरख - अपने आप को "रोबो" कहता हूं, तकनीकी विशेषज्ञ कहता हूं, लेकिन मुझे कभी औरकुट एडिक्शन ही नहीं हुआ! डूब मरना चाहिये चुल्लू भर पानी में! मुझे अपनी अज्ञानता पर लानत है!

समय बीतता गया, और मुझे पता चला कि मेरे तकरीबन-तकरीबन सारे मित्रों को औरकुट एडिक्शन कभी न कभी रहा है, लेकिन मुझ अभागे को ये सौभाग्य कभी प्राप्त नहीं हुआ है। सबसे दु:ख भरी दास्तान तो ये है - मुझे नहीं लगता कि मुझे कभी ये सौभाग्य भविष्य में मिलेगा।

हाय राम, सब को हुआ, मुझे कभी न होगा! अत्यंत नाइंसाफी है - घोर कलयुग है!

मुझे लगता है मुझमें ऐसा कुछ है जोकि मुझे औरकुट के नशे से बचाये रखता है। जाने क्या है, लेकिन कोई अगर मुझपर अनुशोध करे, तो मैं गिनीपिग बनने को तैयार हूं - शायद इससे कई लोगों के जीवन में खुशियां आयेंगी।

और अब मैं इंतज़ार कर रहा हूं कि कोई आये, और मुझे देखकर औरकुट-एडिक्शन का एक रामबाण बनाये!

2 टिप्‍पणियां:

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

बहुत ही सहीं चित्र खींचा है आपने आरकुट प्रेमियों का । वैसे यह वेबसाईट मित्रों का उसी तरह से ठिकाना है जैसे पान ठेला पर दोस्तों की जमघट । बोरिंग व गाली गुफ्तार से भरे चैट रूम से तो यह एक अच्छी जगह है ।

पा ... दिन भर ठेले पर जमें रहना भी ठीक नहीं ... और भी काम काज है भाई, सहीं कह रहे हैं आप ।

उन्मुक्त ने कहा…

लत तो पड़ती है किसी को ऑर्कुट की तो किसी को सिग्रेट की, किसी को शराब की तो किसी को चिट्ठाकारी की :-)