शनिवार, 15 नवंबर 2008

चंद्रयान बना कईयों की आँखों की किरकिरी



कुछ दिनों पहले मैंने सुना की भारत चंद्रयान का प्रक्षेपण करने की तैयारी कर रहा है। सुनकर बड़ी खुशी हुई - एक पल दिल में यह भी खयाल आया कि पहले नहीं भेज सकते थे क्या? चलो कोई बात नहीं, देर आये, दुरुस्त आये।

तो खैर चंद्रयान पहुंच ही गया चाँद पर।

इस खबर से सारी दुनिया में भारतीय लोग गर्व महसूस कर रहे हैं।

लेकिन बाकी दुनिया क्या सोचती है इस बारे में? पूरी दुनिया में घूम-घूमकर तो मैं यह पूछने से रहा। और बात करने पर कोई भी विदेशी कहेगा "बढ़िया है"। तो मैंने अंतर्जाल पर विदेशियों की प्रतिक्रियाएँ पढ़ीं।

पढ़कर पता चला कि सिर्फ भारतीय ही खुश हैं, बाकी सब जल रहे हैं अपने चंद्रयान से।

पेश हैं कुछ प्रतिक्रियाएँ और उनपर मेरे जवाब:

"अब ये भारतीय लोग चाँद पर भी कॉल सेंटर खोलेंगे क्या"?
कॉल सेंटर ही नहीं, घर भी बनायेंगे। कर के दिखाओ क्या कर लोगे?

"बहुत तीर मार लिया! हम तो वहां पर ३० साल पहले ही पहुंच गये थे"
३० साल के बाद दोबारा कभी चाँद पर गये क्या? सिर्फ एक बार के बाद ही फेल हो गये?

"चंड्रायन? यह क्या होता है? चलो इसका नाम बॉलीमून रख देते हैं"
संस्कृत पढ़ी है कभी? या टूटी अंग्रेजी बोलकर ही काम चला रहे हो?

"जैसे ओलंपिक में एक स्वर्ण जीतकर खुश हो रहे थे, वैसे ही इतनी देर से चाँद पर जाकर भारत कितना खुश हो रहा है"
भारत ने चाँद पर जाकर एक नया ओलंपिक शुरू किया है। देखते जाओ, हम ही जीतेंगे!

"आजकल कैसी-कैसी खबरें छपती हैं - जैसे ओबामा को कुत्ता चाहिये, भारत चाँद पर पहुंच गया इत्यादि"
जनाब आप तो पक्के अमरीकन हो। पता है अमरीका में अपनी गली में कुछ होता है तो वो "राज्यस्तर" का होता है, और अपने शहर में कुछ होता है तो वह "राष्ट्रीय" होता है, और अपने राज्य में जो होता है वह "अंतर्राष्ट्रीय" होता है। और जो अमरीका के बाहर होता है वह "कुछ नहीं" होता है। समझ में आई बात?

"चाँद पर अपना झंडा गाड़ने से पहले बुश से अनुमति ली थी क्या?"
बुश तो मुशर्रफ बन गये। महाभियोग लगने से पहले ही गद्दी से भाग निकले। उनकी अनुमति का क्या फायदा? परंतु मैं तुमसे एक सवाल पूछता हूं - एक अमरीकन कंपनी थी जो चाँद पर जमीन बेच रही थी - उसका क्या हुआ?

"गाँधी, गाँधी!"
कुछ विदेशियों को भारत के बारे में सिर्फ एक तथ्य पता है, वो है गाँधी। आप भी उन्हीं अंधों में से एक हैं।

"चाँद पर ३५०० मील प्रति घंटा की गति से उतरा या आ गिरा?"
यह कोई जहाज नहीं था जिसे धीरे से उतारा जाये। इसे तेजी से गिराया जाना था, ताकि चाँद के वातावरण में फैली गैसों के नमूने सभी ऊंचाइयों से लिये जा सकें। चाँद से टकराने पर सतह से निकली धूल-मिट्टी का भी तो मुआयना करना है। धीरे से उतारोगे तो मिट्टी उड़ाने क्या तुम्हारा बाप आयेगा?

"पहले गुजरात और महाराष्ट्र में सरकार और राजनेताओं द्वारा मारे जा रहे लोगों को बचाओ, फिर चाँद की बात करो"
पहले इराक में मारे गये ६ लाख लोगों का हिसाब दो, फिर मुँह खोलो।

"अब चाँद पर भी भारतीय परमाणु मिसाइलें लगाओगे क्या?"
बिलकुल!

"अब तो मेरी नौकरी भी भारत चली जायेगी - मैं क्या करूंगा?"
कभी पढे-लिखे नहीं, बस अमेरिकी होने के बाबत नौकरी लेके बैठे थे। अब बेरोजगार हो। तुम्हारी नौकरी किसी हिंदुस्तानी या चीनी-जापानी को चली गयी है। खुद नहीं पढ़े तो कम से कम अपने बच्चों को तो पढ़ा दो!

"बेरंग क्यों, रंगीन तस्वीरें क्यों नहीं? क्या भारतीयों के पास रंगीन कैमरे नहीं हैं?"
अंतरिक्ष में रंग नहीं होते। सभी तस्वीरें बेरंग होती हैं। उनका बाद में संपादन करके रंग भरे जाते हैं ताकि उनके आयामों को ठीक से देखा जा सके। NASA भी जो रंगीन तस्वीरें दिखाती है, वह भी पहले बेरंग ही होती हैं, उनमें बाद में रंग भरा जाता है। और एक बात - बेरंग तस्वीरों में सूक्ष्म चीज़ों को भी विस्तार से दिखाया जा सकता है, लेकिन रंगीन तस्वीरों में ऐसा करने पर यह क्षमता नहीं रहती।

तो समझ में आयी बात? नहीं आयी तो भारत में आइयेगा, समझा देंगे।

5 टिप्‍पणियां:

Cyril Gupta ने कहा…

Superb! ...

सागर नाहर ने कहा…

पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ, पहला लेख पढ़ते ही मजा आ ही गया।
बहुत शानदार लिखा है।


॥दस्तक॥
गीतों की महफिल
तकनीकी दस्तक

विनय ने कहा…

भारत की इस सफलता पर बधाई कि आपने इसे लेख में प्रस्तुत किया!

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

शानदार लेख

Neetesh ने कहा…

हा हा........बढ़िया लिखा :)
बचपन में एक दोहा कहीं पढ़ा था, जिसका भावार्थ ऐसा था "की जो आपसे इर्षा करता है, उसे और दण्डित करने की आवश्यकता नही....इर्षा की आग उसे ख़ुद ही जला कर कष्ट दे रही रही है!"
तो हम हिदुस्तानियों को तो बस खुश होकर मिठाइयां बांटनी चाहिए, और इन जलने वालो को अपने अच्छे कामो से और जलना चाहिए. :D
जय हिंद!