सोमवार, 1 दिसंबर 2008

सड़ते लोकतंत्र को बचायें


भारत में १ अरब से भी ज्यादा लोग रहते हैं। इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी ढाई करोड़ से भी अधिक सैनिकों के कंधे पर है। इन करोड़ों सैनिकों की बागडोर ५०० से भी अधिक नेताओं के हाथ में है। लेकिन सैनिक अपने आप कुछ नहीं कर सकता - उसे आदेश चाहिये होता है। यदि आदेश देने वाले राजनीति के चलते अपनी जिम्मेदारी से मुकर जायें, तो ढाई करोड़ सैनिकों की सेना भी कुछ नहीं कर सकती।

पिछले हफ्ते मुंबई में यही हुआ। हमारे चुने गये नेताओं को जब पता चला कि मुंबई पर हमला हुआ है, तो उन्होने आधा दिन तो इसी पेशोपस में लगा दिया कि कमांडो भेजे जायें या नहीं। जब १२ घंटे बाद दिल्ली से कमांडो भेजे गये, तो कहानी थोड़ी आगे बढ़ी, लेकिन फिर भी ३ दिन लग गये १० आतंकियों को मौत के घाट उतारने में।

यह तो सिर्फ कुछ बंदूकों और बमों का हमला था, जिससे निपटने में "सिस्टम" को ३ दिन लग गये। पाकिस्तान से दागा गया परमाणु बम भारत में ३ मिनट में पहुंच कर फट जायेगा। तब हम क्या करेंगे? कहाँ जायेंगे?

सबसे बड़ा रोना इस बात का है कि धर्म के नाम पर भारत में रैलियाँ निकालने वाले लोगों की कमी नहीं है, लेकिन आतंक के खिलाफ अभी तक कोई भी बड़ी रैली मुंबई के बाहर नहीं निकली है। कारण है कि लोगों को एकजुट करने के लिये कोई नेता चाहिये होता है, और हमारे सारे नेता अपना पेट भरने में व्यस्त हैं। भ्रष्टाचार देश को लील रहा है। राजनैतिक भ्रष्टाचार के चलते देश के हितों को कितना नुकसान हो रहा है, यह मुंबई में आपके सामने है।


गलती लोगों की भी है - भ्रष्टाचार से लड़ने के बजाय लोग खुद ही भ्रष्टाचार में लिप्त हो रहे हैं। मैं पिछले साल अंतर्राष्ट्रीय विमान से जब दिल्ली उतरा, तो कस्टम अधिकारियों को १५,००० रुपये की रिश्वत देकर अपना सामान छुड़ाया था। मैं दोषी हूं - और अपने "लेवेल" पर मुझमें इतने बड़े "सिस्टम" से लड़ने की ताकत फिलहाल नहीं है।

सिफारिश और घूस लेकर यदि कोई कमांडो या सैनिक बन भी जाये, लेकिन देश से लड़ने की ताकत उसमें नहीं पैदा की जा सकती। भ्रष्टाचार ने भारतीय लोकतंत्र को बुरी तरह सड़ा दिया है, और जल्द ही इसे ठीक करना होगा।

यदि आप चाहते हैं कि हमारा देश तरक्की करे, और मुंबई जैसी वारदातें न हों , तो कुछ बातों पर ध्यान दें:

१) सार्वजनिक संस्थाओं को सबसे ज्यादा नुकसान रिश्वत से होता है। प्रण करें कि न आप रिश्वत लेंगे, न ही देंगे। यदि रिश्वत की मांग होती है तो भ्रष्टाचार-विरोधी दस्ते को फोन करें। नंबर यहां से लें।

२) यदि आप नये कर्मचारियों की भर्ती करते हैं तो प्रण करें कि पद योग्यता के आधार पर दें, न कि "जान-पहचान", "रिश्तेदारी" या "घूस" के आधार पर। सिर्फ योग्य कर्मचारी हिंदुस्तान की किस्मत बदल सकते हैं!

३) यदि लोकतंत्र में कुछ गलत हो रहा है, या आपको कुछ पसंद नहीं है, तो चुप न बैठें, अपने विचार व्यक्त करें - पत्र लिखकर अपने इलाके के अधिकारियों को अवगत करायें, जनसमितियों में वह मामला उठायें, अखबारों को पत्र लिखें, और यदि कुछ भी नहीं बन पाता तो थोड़ा सा ब्लौगिया लें।

४) यदि मतदान के समय कोई भी प्रत्याशी आपको सही नहीं लग रहा है, तो घर पर न बैठें - मतदान केंद्र तक जाकर सभी दलों से बात करें - उन्हें बतायें कि वे सारे क्यों नालायक हैं। और फिर धारा 49-O का प्रयोग करते हुये मतदान करें। 49-O से डाले गये वोट किसी भी प्रत्याशी को नहीं जाते, यह लोकतंत्र में विरोध प्रकट करने का एक प्रावधान है। अधिक जानकारी यहाँ पर है (माफ कीजिये सिर्फ अंग्रेजी में ही मिला, हिंदी में अभी तक किसी ने अनुवाद नहीं किया है)

५) हमेशा याद रखें - हिंदुस्तान रहेगा तो हम रहेंगे, हिंदुस्तान खत्म तो हम खत्म! भारत के बारे में सोचें - हम कहाँ हैं, कहाँ जा रहे हैं, और क्या-क्या करना है। अकेला व्यक्ति भी बहुत कुछ कर सकता है, किसी और के साथ का इंतज़ार न करें।

६) इस संदेश को हर जगह फैलायें।

जय हिंद!

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

जय हिन्द.. बातें बन्द काम शुरु.. अभी से..