शनिवार, 20 दिसंबर 2008

क्या अध्यापकों को बच्चों की पिटाई करने का अधिकार है?

सभी माँ-बाप अपने बच्चों को पाठशाला इसलिए भेजते हैं ताकि वे वहाँ से अच्छी शिक्षा लेकर अपना जीवन सफल बनाएं। लेकिन यदि उसी पाठशाला में पाठ के जगह बेंत दिए जाएँ, और सफलता की जगह मौत मिले, तो इसे आप क्या कहेंगे?

मिस्र में एक अध्यापक ने एक ११ वर्षीया छात्र को इसलिए पीटा क्योंकि वह अपना होमवर्क नहीं करके लाया था। कक्षा में बेंत लगाने के बाद अध्यापक छात्र को कक्षा के बाहर ले गया और उसकी पुरजोर पिटाई की। पेट और छाती पर चोट लगने के बाद छात्र बेहोश हो गया, और अस्पताल में दिल की धड़कन रुकने से दम तोड़ गया।



(११ वर्षीय इस्लाम अम्र बद्र जिसकी अध्यापक द्वारा पीटे जाने पर मौत हो गई)

मुझे अपने बचपन के दिन अभी तक याद हैं। सारी ज़िन्दगी सरकारी स्कूलों में पढ़ा, अध्यापकों से भरपूर डंडे खाए, मुर्गा भी बना, गालियाँ सुनी, बदबूदार शौचालय इस्तेमाल किया और काई जमा हुआ हरा पानी भी पिया। सौभाग्य से मैं मरा नहीं। लेकिन अब पीछे लौटकर देखता हूँ तो ऐसा प्रतीत होता है कि भारत के कई स्कूलों में छात्रों को मारने के लिए पूरा समान और तैयारी मौजूद है। यदि विश्वास न हो तो पूरे भारत में मुझे आप एक ऐसा सरकारी स्कूल दिखा दीजिये जहाँ बच्चों को पीटने के लिए डंडा नहीं हो। जैसे मन्दिर में भगवन की मूर्ति ज़रूर होती है, ठीक उसी प्रकार सरकारी स्कूल में डंडा ज़रूर होता है।

जिन अध्यापकों ने मुझे पीटा था, उनमें से कम ही की शक्लें मुझे याद हैं। लेकिन जिन्होनें मुझे प्यार से पढाया, उनको मैं आज भी याद करता हूँ और उनका नाम गर्व से लोगों को सुनाता हूँ। मेरा यह मानना है कि आप किसी को प्यार से सब कुछ सिखा सकते हैं, लेकिन डंडे के ज़ोर पर सिर्फ़ "डरना" सिखा सकते हैं।

लेकिन अध्यापक बच्चों को पीटते क्यों हैं? अध्यापक भी एक आम आदमी होता है। अपने जीवन की असफलताओं से उसे भी तनाव होता है। मुझे यह लगता था कि मेरे कुछ अध्यापक अपने जीवन का तनाव कम करने के लिए मेरी पिटाई किया करते थे। यह नैतिक रूप से तो ग़लत है ही, बल्कि कानूनी रूप से भी सही नहीं है।

१ मिनट मौन रखकर सोचिये - बच्चों की बेरहमी से पिटाई करने वाले अध्यापक क्या आतंकवादियों से कुछ कम हैं?

मेरी यह माँग है कि समूचे भारत में हो रहे इस रोज़मर्रा के आतंक के ख़िलाफ़ कानूनी मुहीम चलायी जाए और बच्चों की पिटाई करने वाले अध्यापकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो। यह आतंक के विरुद्ध लड़ाई का एक "अनकहा" लेकिन ज़रूरी हिस्सा है।

12 टिप्‍पणियां:

Arvind Mishra ने कहा…

जी सही है जो काम प्यार से हो जाता है वह दंड से नही -आप किसी को शाबाशी तो दीजिये देखिये वह कैसे आपकी अपेक्षाओं को पूरा करता है !

Vivek Gupta ने कहा…

उत्तम विचार

Ankur Gupta ने कहा…

अरे भैया! जिस दिन स्कूल से विदाई हुई चैन की सांस ली हमने. जी छूटा इस पिटाई से. लेकिन सदमा ऐसा लगा है कि आज भी सपने में टीचर की पिटाई खाते हैं. फ़िर डर के मारे उठ के बैठ जाते हैं.

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर ने कहा…

"लेकिन अध्यापक बच्चों को पीटते क्यों हैं? अध्यापक भी एक आम आदमी होता है। अपने जीवन की असफलताओं से उसे भी तनाव होता है। मुझे यह लगता था कि मेरे कुछ अध्यापक अपने जीवन का तनाव कम करने के लिए मेरी पिटाई किया करते थे।"


aur bhi kai baaten hoti hain!! is pitaai ke peeche !!

par aap sach kah rahe hain!!

par yah sach hamesha sach nahin hota hai!!!

समयचक्र - महेद्र मिश्रा ने कहा…

बच्चा जब अनुशासित न हो तब पिटाई जरुरी है बाकी हमारे ब्लॉगर मास्टर भैय्या से पूछ ले

Neetesh ने कहा…

मैंने भी जीवनपर्यंत सरकारी स्कूल से शिक्षा ग्रहण करी.......अब सरकरी स्कूल का चित्रण तो आपने बखूबी कर ही दिया है. आश्चर्य की बात है की आप जिस सरकारी स्कूल का वर्णन कर रहे है, वह मेरे स्कूल से १००% मेल खाता है! ऐसा जैसे की भारत के सभी सरकारी स्कूल किसी केन्द्रीय आचार संहिता का पालन कर रहे हो...... हा हा हा.....
कुछ और विशेषताए और जोड़ना चाहूँगा..........मेरे स्कूल में शिक्षक विद्यार्थियों को ऐसी ऐसी गलियां देते थे, जो की इस ब्लॉग में तो लिखी ने नही जा सकती........उन्होने ने ही हमें "पशु विशेषण" गलियों से आगे हटकर कुछ नई गलियों से परिचित करवाया...........हमारे एक शिक्षात बेखौफ कक्षा में विद्यार्थियों पर हाथ से duster फेंक दिया करते थे.........कई बार निशाना चूकने पर मासूम विद्यार्थी के सर से उस प्रक्षेपित duster का संपर्क हो जाया करता था........
आज कई सालों बाद मैं सोचता हूँ, की क्या आज मैं किसी छठी कक्षा के बच्चे पर duster फेंक सकता हूँ? वो किस किसम का इंसान रहा होगा, जो की एक बच्चे पर duster फेंकता हो, उसे एक मोटे डंडे से बेदम पीटता हो??
खैर, विद्यार्थियों को अनुशासित करने के लिए थोड़े बहुत दंड के आवश्यकता तो है ही, परन्तु शारीरिक पीडा दे कर दण्डित करना किसी भी दृष्टिकोण से सही नही है........दण्डित करने के और भी कई तरीके है. सज़ा दीजिये, पालक को शिकायत कीजिये, पर भगवान् के लिए एक छोटे बच्चे को शारीरिक पीडा मत दीजिये.

Suresh Chandra Gupta ने कहा…

जो अध्यापक बच्चों को अनुशाषित करने के लिए शारीरिक यातना का सहारा लेता है वह अध्यापक होने योग्य नहीं है. बच्चों को मारना कोई अधिकार नहीं है, यह एक अपराध है, इसकी सजा अध्यापक पद से निकाल दिया जाना ही होनी चाहिए.

संगीता पुरी ने कहा…

मेरे ख्‍याल से भी जो शिक्षा प्रेम से दी जा सकती है , पिटाई से नहीं , पर इस दिशा में मां पिताजी को भी ध्‍यान देना चाहिए। कई मां बाप बच्‍चे को मार पीटकर इतना उददंड बना देते हैं कि बच्‍चे प्‍यार से समझते ही नहीं और शिक्षकों को भी परेशानी आती है। इसके अतिरिक्‍त कुछ बच्‍चे अपने स्‍वभाव की वजह से भी मार खाते हें। लेकिन बच्‍चे यदि बात माननेवाले हों , तो उनकी छोटी छोटी गलतियों में उन्‍हे मारना नहीं चाहिए।

ab inconvenienti ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
ab inconvenienti ने कहा…

You are studying medicine, in US.Have you gained some kickbacks (from US agents) for advocating IN FAVOR OF otherwise lethal and nearly obsolete nuclear power technology in the guise of just another blogger? for propaganda in Hindi blog arena, just like superpowers work, controlling any and every media, you know!

For God's sake, being a responsible physician how can you overlook these hazards before advocating nuclear deal? That puzzles me!

if you can clear my doubt, my mail is: limestone0km@yahoo.com

ab inconvenienti ने कहा…

Here are the links of the sites revealing the truth behind Nuclear Electricity.

Is it worth it????

Anil ने कहा…

ab inconvenienti जी, मैंने परमाणु संधि पर कभी कोई चिट्ठा नहीं लिखा. बल्कि मैंने उसपर चिट्ठा न लिखने पर चिट्ठा लिखा था - जरा नजर डालें:
http://xn--l1b4e4a1c.blogspot.com/2008/07/blog-post_18.html .

मुझे लगता है आपको कोई गलतफहमी हुयी है. यदि आप हिंदी न समझते हों तो अंगरेजी में लिख देता हूं - Please give me some information of why you are so mad at me? मुझे बतायें कि आपको मुझपर गुस्सा क्यों है?