शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

बस यही फर्क है


एक दिन एक माली बाल कटवाने गया। बाल काटने के बाद नाई ने पैसे लेने से मना कर दिया। कहा कि "मैं तो जनता की सेवा कर रहा हूँ, इसके पैसे नहीं ले सकता।" माली चुपचाप वहाँ से चला गया।

अगले दिन जब नाई ने अपनी दुकान खोली, तो वहाँ कुछ फूल रखे पाये। साथ में कागज का एक पुर्जा भी रखा था, जिसमें लिखा था "कल आपने मेरी सेवा की, पैसे भी नहीं लिये। मेरा भी आपके लिये कुछ फर्ज बनता है। ये ताजा फूल मैं आपके लिये छोड़ रहा हूँ, आशा है आपको पसंद आयेंगे।"

फिर एक अध्यापक बाल कटवाने आया। नाई ने उससे भी पैसे नहीं लिये। कहा "मैं तो जनता की सेवा कर रहा हूँ, इसके पैसे नहीं ले सकता।" अध्यापक चुपचाप वहाँ से चला गया।

अगले दिन नाई ने दुकान खोली, तो वहाँ कुछ ज्ञानवर्धक पुस्तकें रखीं पायीं। साथ में कागज के पुर्जे पर लिखा था "कल आपने मेरी नि:स्वार्थ सेवा की। मेरा भी आपके लिये कुछ फर्ज बनता है। ये पुस्तकें आपके लिये छोड़ रहा हूँ, आशा है आपको अच्छी लगेंगी।"

फिर एक भिखारी बाल कटवाने आया। नाई ने उसके भी बाल बड़े मन लगाकर काटे, कोई पैसे नहीं लिये। कहा "मैं तो जनता की सेवा कर रहा हूँ, इसके पैसे नहीं ले सकता।" भिखारी चुपचाप वहाँ से चला गया।

अगले दिन नाई ने दुकान खोली, तो वहाँ एक कागज का पुर्जा रखा हुआ था। लिखा था "आपने मेरी नि:स्वार्थ सेवा की। मेरा भी आपके लिये कुछ फर्ज बनता है। मैं आपको और कुछ तो नहीं दे सकता, लेकिन मंदिर में जाकर आपके लिये भगवान से प्रार्थना करूंगा"

फिर एक नेता बाल कटवाने आया। नाई ने उससे भी बाल काटने के कोई पैसे नहीं लिये। कहा "मैं तो जनता की सेवा कर रहा हूँ, इसके पैसे नहीं ले सकता।" नेता चुपचाप चला गया।

अगले दिन जब नाई दुकान खोलने पहुँचा, तो देखा कि वहाँ कई दर्जन नेता मुफ्त में बाल कटवाने के लिये खड़े हैं।

बस यही फर्क है।

10 टिप्‍पणियां:

राजीव जैन Rajeev Jain ने कहा…

बहुत ही जबरदस्‍त

एकदम प्रभावित करने वाली कहानी है

नए युग की पंचतंत्र जैसी कहानी लग रही है


बधाई

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

सही है .

कुश ने कहा…

बहुत ही धारधार कहानी.. सब कुछ बयां करती हुई..

संगीता पुरी ने कहा…

यही अंतर है आम जनता और नेता में ... बहुत अच्‍छी कहानी।

Udan Tashtari ने कहा…

हा हा!! सटीक परिभाषित किया नेताओं को.

Dr. Munish Raizada ने कहा…

यार! ये आईडिया कहा से लाते हो. न तो हमने बचपन में ये कहानियां पढ़ी, न दादी ने सुनाई, न चंदा मामा या पराग या चम्पक या पंचतंत्र में पढ़ी! अमेरिका में बैठे या ज्ञान प्राप्ति कहाँ से हो रही है! जरा हममें भी तो बताइए, मोक्ष मिले!

Anil ने कहा…

हौसलाअफजाई के लिये सभी दोस्तों का शुक्रिया! मुनीश जी, आपने पूछा कि मैं ये सब आइडिये कहाँ से लाता हूँ। लंबा जवाब है, छोटा करके सुनाता हूँ।

यदि आप किसी मुद्दे से अपने आपको जुड़ा मानते हैं और उसके बारे में रुचि रखते हैं, तो आपको आइडिये अपने आप ही आयेंगे। किसी टौनिक की जरूरत नहीं। ऐसे आइडियों को आप चाहें भी तो भी नहीं रोक पायेंगे।

मनुष्य और खच्चर में यही तो फर्क है! :)

ali ने कहा…

बढ़िया ! बहुत बढ़िया !

गर्दूं-गाफिल ने कहा…

वाह वाह ! बहुत खूब

Dr.Bhawna ने कहा…

बहुत अच्छा लगा पढ़कर...