सोमवार, 16 मार्च 2009

वाह रे गोरी चमडी, तेरा जवाब नहीं!



कल मैं कुछ खरीदारी करने "क्रोगर" नाम की सुपरमार्केट में गया। ऐसे ही घूमते-घूमते एक बढिया सा रंगीन ग्रीटिंग कार्ड दिखायी दे गया, तो सोचा कि चलो भारत में अपने घर पर यह कार्ड भेजा जाये तो मेरे अपने कितने खुश होंगे। अभी मैं कार्ड को समेट ही रहा था कि इतने में एक गोरा आकर मुझसे बोला "एक्सक्यूज मी"! उसने पूछा कि आसपास कोई भारतीय भोजनालय ("रेस्तराँ") हैं, भारतीय खाने का सामान कहाँ से खरीदते हो, उत्तर भारत और दक्षिण भारतीय खानपान में क्या फर्क होता है इत्यादि।

पहले तो मुझे लगा कि वह किसी भारतीय सुंदरी पर फिदा हो गया है, इसीलिये मुझसे भारत के बारे में पूछ रहा है। लेकिन फिर आखिरकार उसने अपने मन की बात कह ही दी। कहने लगा कि उसकी एक अंतरजाल पर सामान खरीदने की दुकान है (औनलाईन शौपिंग)। अभी तो उसकी कंपनी सिर्फ अमेरिका में काम कर रही है, लेकिन जल्द ही वे लोग भारत और चीन जाना चाहते हैं। मुझसे पूछ रहा था कि मैं उसके साथ व्यापारी सहयोग करने का इच्छुक तो नहीं।

भई मैं ठहरा एक गरीब छात्र। न मेरे पास पैसा, न मेरे पास अमेरिका में व्यापार करने का वीजा। तो उसने अपना कार्ड देते हुये मुझे कहा कि यदि मेरा कोई और मित्र व्यापार सहयोग का इच्छुक हो तो वह मेरी मदद का आभारी होगा। मैं कभी अपने झोले में पड़े प्याज और लहसुन को, तो कभी उसकी शक्ल को देख रहा था। मैंने कहा "ज़रूर" और उसको किसी तरह विदा किया।

ये अंगरेज लोग कितने तेज होते हैं। छः सौ साल पहले इन्हें पता चला कि भारत नाम का कोई देश है, जहाँ खूब पैसा है। तो ये लोग व्यापार के बहाने आये, और सब कुछ लूट ले गये। आज इनके अपने राजनीतिज्ञों और बैंकों की गलतियों की वजह से इनके अपने देशों में इनका पैसा डूबा जा रहा है तो ये फिर से भारत आना चाहते हैं।

पहले ही ये लोग यूनीलीवर को "हिंदुस्तान लीवर" का नाम देकर अमेरीकी साबुन, दंतमंजन इत्यादि पचासों सालों से हमें बेच रहे हैं। फिर हमारे किसानों को ऐसे बीज बेचने की कोशिश भी विफल कोशिश कर चुके हैं जो जमें हीं नहीं। और आजकल युवा पीढी में इन्होंने इतालवी परांठे ("पिज्जा") और विलायती कंचे के खेल (बोलिंग) को जिस तरह से "फैशनेबल" बनाकर भुनाया है, उसके बाद भी इनकी पूंजीवादी भूख नहीं मिट रही।

वाह रे गोरी चमड़ी, तेरा जवाब नहीं! जहाँ पूंजी, वहाँ तू! बाकी सब बकवास!

7 टिप्‍पणियां:

नीरज गोस्वामी ने कहा…

ये अँगरेज़ बड़ी शातिर कौम है...पैसे के लिए कुछ भी कर गुजरने वाली...आपने इनका एक दम सही चित्रण किया है...
नीरज

Sachi ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Sachi ने कहा…

व्यवसाय का जमाना कब नहीं था? हमही घर पर बैठ गए थे और तब पुर्तगाली और अँगरेज़ आकर लात मारकर गए..

बेहतर है कि हम इनसे कुछ सीखें, न कि इन्हें हम कोसें..
वैसे मैं कई स्पेनिसों और पुर्तगालिओं को जानता हूँ, जो भारत से बहुत प्यार करते हैं, और हिंदी की दुर्दशा पर दुखी हैं. वे हिन्दी सीख रहे हैं, किसी स्वार्थ के खातिर नहीं, बल्कि वे भारत को चाहते हैं..

Dr. Munish Raizada ने कहा…

अनिल जी: यह बात जमी नहीं. गोरी चम्म्दी पर इतना गुस्सा क्यों! अपने इतिहास पर भी तो निगाह डाल कर देखिये. बुरी तरह बटा हुआ प्राचीन भारत , जो की रजवाडो का एक जमावडा था. मुगलों ने यहाँ आकर राज किया, कितने शर्म की बात है. राज ही नहीं किया, वास्तव में भारतीय सभ्यता तथा संकृति के साथ भी खिलवाड़ किये , बोधिस्म को भारत से बहार निकाल फेंका.भारत की जनता तथा लोग क्या कर रहे थे तब? अंग्रेज इतने लम्बे टाइम टिके रहे, गलतिया हमारी भी थी.

cmpershad ने कहा…

धन का एक ही रंग होता है भैया- गोरी हो या काली या पीली- सभी पैसे का ही तो चक्कर है:)

जी.के. अवधिया ने कहा…

विदेशी जो कर रहे हैं उसे हम लोग ही तो बढ़ावा देते हैं। मैं स्वयं विद्यार्थी जीवन तक बबूल का दातून किया करता था पर बाद में टूथ पेस्ट इस्तेमाल करने लग गया जो कि विदेशी कंपनियों के द्वारा बनाया जाता है।

बालसुब्रमण्यम ने कहा…

व्यापार में हम भी कहां पिछे थे। मुगलों के जमाने में हमें यों ही सोने की चिड़िया नहीं कहा जाता था।

कहते हैं जहांगीर के दरबार में जब पहले-पहले अंग्रेज व्यापारी पहुंचे, उनके पास ऐसा कोई सामान था ही नहीं जो बादशाह के लायक हो।

अकबर स्वयं व्यापार करते थे, और बंदूक, घोड़े आदि के व्यापार में उनका इजारा था। मुगलों की बेगमें भी व्यापार में मंजी हुई थीं।

अंग्रेजों ने यहां आकर इस परंपरा को नष्ट करने की भरसक प्रयास किया, पर पूरी तरह सफल नहीं हुए।

मारवाड़ी, पटेल, चेट्टियार, जैन आदि व्यापारी कौमें अंग्रेजों के समय भी खूब फले-फूले।

आजादी के बाद उनकी जमात में और लोगों को भी जुड़ने का मौका मिला। इसी तरह हमारे इन्फोसिस, रिलाएन्स, सत्यम आदि बने।

पैसे के पीछे भागने को हम हिकारत की दृष्टि से देखते हैं। पर यदि इसे ईमानदारी से किया जाए तो इसमें कुछ भी बुरा नहीं है।