शनिवार, 18 अप्रैल 2009

भारतीय पुरुषों के बारे में एक अमेरिकी महिला की राय


पिछले दिनों मेरी एक अमेरिकी सहपाठिन की शादी का न्यौता आया। एक-दूसरे की संस्कृति के प्रति जिज्ञासावश हमने भारतीय और अमेरिकी शादी के रीति-रिवाजों पर चर्चा की।

मौका देख मैंने उससे पूछ ही लिया, "भारतीय पुरुषों के बारे में आपके क्या ख़याल हैं?"

अमेरिकी संस्कृति में यह खास बात है कि किसी की बुराई करो, तो भी नरमी से। तो उसने पहले तो भारतीय पुरुषों की खूब तारीफ की, कि उनकी त्वचा का रंग बहुत बढ़िया होता है, उनकी आँखें बड़ी-बड़ी होती हैं, सभी पेशेवर पढ़े-लिखे होते हैं, अमेरिका में सर्वाधिक पैसा कमाते हैं, इत्यादि। लेकिन होते-होते उसने अपनी एक पुरानी सहेली के बारे में बताया, जिसने एक भारतीय से शादी की थी। पता चला कि उसकी सहेली का भारतीय पति बहुत ही नेक इंसान है और उसका व्यक्तित्व बहुत ही दृढ़ है। लेकिन उसको रसोई का कोई काम नहीं आता। यहाँ तक कि अपने आप चाय तक नहीं बना सकता।

मुझसे थोड़ा और खुलने के बाद उसने कहा "मैं दुनिया के किसी भी मर्द से शादी कर लूँगी, लेकिन किसी भारतीय से कभी नहीं। भारतीय पति मुझे रसोई में कभी मदद नहीं करेगा, और मेरा सारा जीवन रसोई में खाना पकाते ही बीतेगा।"

मैं सोचने पर मजबूर हो गया।

उसके दो दिन बाद मुझे एक दोस्त का फोन आया, जो मेरे साथ दिल्ली में ही पढ़ता था। भारत से ही शादी करके वह अमेरिका में आया हुआ है। उसकी बीवी को किसी कारणवश कुछ दिनों के लिये भारत जाना पड़ा। जाने से पहले तथाकथित "आदर्श भारतीय पत्नी" की तरह वह अपने पतिदेव के लिये रोटी-सब्जी बनाकर फ्रिज में रख गयी। रात को मेरे दोस्त को भूख लगी, तो उसने सब्जी तो माइक्रोवेव में गरम कर ली। लेकिन जब वह जीवन में पहली बार तवे पर रोटी गरम करने लगा, तो सारी रोटियाँ सख्त होकर पापड़ बन गयीं। उसने मदद के लिये मुझे फोन किया, और मैंने उसे डेढ़ घंटा लगाकर रोटियाँ गरम करना सिखाया।

वाकई भारतीय मर्दों के बारे में उस अमेरिकी महिला के विचार बिलकुल वाजिब थे।

छठी कक्षा में जब मैंने चित्रकला छोड़कर गृह-विज्ञान विषय लेने के लिये माँ से बात की थी तब उन्होंने मुझे मना कर दिया था। "ये तो लड़कियों का काम है, तू क्या करेगा?" वह अलग बात है कि वही सब काम मुझे अमेरिका में अकेले रहते हुये सीखने ही पड़े। भारत में जिन कामों को लड़कियों का काम समझा जाता है, वे दरअसल "जानबचाऊ यंत्र" हैं!

कुछ सवाल: महिला और पुरुष के अधिकारों की बराबरी को समर्थन देने वाले कितने पुरुष रसोई में खड़े होकर चाय बनाते हैं? इन्हीं "गृहकार्यों" में यदि भारतीय पुरुष महिलाओं का हाथ बँटायें तो महिलाओं को सशक्तीकरण के लिये कितना समय और ऊर्जा मिल सकेगी!

ज़रा सोचिये।

28 टिप्‍पणियां:

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee ने कहा…

संस्मरण सार्थक व व्यावहारिक है।

Vivek Rastogi ने कहा…

यह भारतीय पुरुषों का दोष नहीं, हमारा सामाजिक ढाँचा ही ऐसा है।

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

बिलकुल सही कहा आपने ..मुझे यह सहयोग मेरे जीवनसाथी से हर वक्त प्राप्त होता है.

-कौतुक ने कहा…

तो मैं कह सकता हूँ कि मैं इस पुरुष स्त्री के भेद भाव से एक हद तक दोष मुक्त हूँ. घर में खाना बनाने, पोछा लगाने से ले कर बच्चे पालने में निपुण हूँ. :D

नहीं ऐसा नहीं है. मैं अभी भी भेद कर जाता हूँ, हालाँकि उसका ख्याल आते ही उसे सुधार भी लिया करता हूँ.

उसने सही कहा पर यह सब पर लागू नहीं होता है. इन गोरों के दुसरे लोगों के प्रति व्यक्त किये गए विचारों को मैं रत्ती भर भी भाव नहीं देता, ये अपने अलावा बाकी दुनिया को एक चस्मा लगा कर देखते हैं. बिना वास्तविकता का भान किये औरों के बारे में अपने विचार कभी कोरी बकवास सुनकर और पत्रिकाएं पढ़ कर बना लेते हैं. उसपर गोरों के अलावा बाकियों में उन्हें कमियां ज्यादा दिखती हैं. You can find a sense if ignorance among them for others.

खैर हम अपनी बात करें तो...हम लोग बायस्ड हो कर लड़कियों को कमजोर समझ ऐसे काम देने लगते हैं जिसमे उन्हें बाहरी दुनिया से उलझना न पड़े. हम protectionsit हैं. मैं ने अपने लगभग डेढ़ सालों के लन्दन प्रवास में यह देखा कि वहां न सिर्फ अधिकार बल्कि जिम्मेदारियां भी बराबर बाँटीं जाती हैं. इस से महिलाओं में एक स्वाभिमान और आत्मविश्वास आता है. छोटी छोटी बाते हैं. जो हमारा ध्यान मांगती हैं.

एक उदहारण लीजिये, यह सच्ची और मेरे घर की ही घटना है. पर उतना अनूठा नहीं है, हर घर में होता होगा.

मैं अपने बेटे और बेटी को लेकर बाजार जाता हूँ, एक नूडल्स का पैकेट, आधे दर्जन अंडे और कुछ फल खरीदता हूँ. घर लौटते हुए मैं बेटे के हाथ में अंडे का पैकेट देता हूँ, बेटी को नूडल्स का और फल की थैली मैं स्वयं रखता हूँ. पर नहीं, मेरी बेटी फल की थैली, जो वजन में एक किलो है, चाहती है. अब यहाँ मैं पिता हूँ, वह बच्ची है और सिर्फ ढाई साल की है यह सोच कर उसे यदि थैली नहीं देता तो मैं बेटे और बेटी में फर्क कर रहा हूँ. मैं ऐसा नहीं करता. उसे फल की थैली दे देता हूँ. वह उसे दो तीन मिनट अपने हाथ में लेकर चलती है फिर वापस दे देती है कि भाड़ी है आप ही रखो और नूडल्स का पैकेट ले लेती है. इस पूरे प्रकरण के अंत में मैं देखता हूँ कि उसके चेहरे पर एक आत्मविश्वास और संतोष का भाव है.

ऐसी छोटी सी घटना से ले कर बड़ी बड़ी घटनाओं में हम ऐसा व्यवहार में भेद करते रहेंगे तो दो जब तक ये बच्चे बड़े होंगे तब तक उन दोनों में यह भावना घर कर चुकी होगी कि लड़का और लडकी बराबर नहीं है. फिर वही होगा जो कि एक आम भारतीय पुरुष करता है "यह लड़कियों का काम है और वह लड़कों का". यह भी सच है कि आज के समय में बहुत से लड़कों को लड़कियों वाले और लड़कियों को लड़के वाले करने पड़ते हैं.

इसे बदलना है तो सिर्फ विचार नहीं जीवन शैली बदलनी होगी.

Neeraj Rohilla ने कहा…

अनिल जी,
हमने तो इस बारे में पूरी एक पोस्ट ही लिख डाली है, अपनी मित्र को हमारा नंबर दे दो और कहो कि हम खाना बनाने को कभी भी तैयार हैं :-)

http://antardhwani.blogspot.com/2007/07/blog-post.html

सतीश पंचम ने कहा…

चाय बना रहा हूँ :)

Arvind Mishra ने कहा…

होस्टल में रह लेने वाले बन्दे रसोईं कार्य में दक्ष हो जाते हैं ! मैं होस्टल में लम्बे समय तक रहा हूँ ! चाय से लेकर खिचडी तक बना लेना ऐसे पुरुषों के लिए बाएँ हाथ का खेल है !

PD ने कहा…

bhai.. ham bhi khana banaane me ustad ho chuke hain.. so ham bhi aapki mitra ke liye line me hain.. ;)

Just kidding bhai.. don't take it seriously.. :)

रचना ने कहा…

is prakaar kae laekhan ki hindi blog jagat ko bahut jarurat haen . kyuki blg ki pahuch vishv vyaapt haen is liyae aap ki likhi baatey agar ek kae bhi kaam aagayee to maan lae ki aap kae blog par diya hua samay bahut saarthak haen

aap ko nirantar padhtee hun achcha prayaas haen aap kaa , taarif kartee hun kament kam aana is baat ka bhi dyotak haen ki aap ki baat itni sahii haen ki us par koi vivaad hi nahin ho saktaa


aur please neeraj rohila ji ki baat par jarur dhyaan dae . jo khul kar keh rahey haen usko samjhey aur aagey badh kar apni dost ko unsaye milavaaye .
ho saktaa haen dono ko wo mil jaaye jis ki unhey talaash haen

neeraj well commented

रचना ने कहा…

यह भारतीय पुरुषों का दोष नहीं, हमारा सामाजिक ढाँचा ही ऐसा है। vivek ji samajik vyavstha ko badlana hamaarey haath mae haen -कौतुक ji nae vahii kiyaa


aur pd bhi line mae accha lagaa

daal roti chawal blog par bahut din sae koi receipe nahin aayee haen
purush mitro sae aagrah haen wahaan kuch post karey

ravishndtv ने कहा…

बात सही है। बचपन में इस तरह की डांट हमें भी खूब पड़ी है कि तुम रसोई में क्या कर रहे हो? कारण हम सब जानते हैं। लेकिन आपकी अमरीकी महिला मित्र ने जिस तरह से सच्चाई को कमज़ोरी के रूप में रखा है, वो बहुत ही शानदार है। तमाचे जैसा।

Anil ने कहा…

लवली कुमारी जी, आपके जीवनसाथी घर के कामों में हाथ बँटाते हैं, वाकई में आप बहुत भाग्यवान महिला हैं! विवेक रस्तोगी जी ने जो बात कही, उसकी विस्तृत समीक्षा के लिये कौतुक जी का धन्यवाद! PD जी, नीरज जी, और अरविंद जी की पाककला में निपुणता की गाथायें पहले भी कहीं पढ़ चुका हूँ, हम सब लोग मिलकर एक शानदार पार्टी कर सकते हैं! पार्टी के बाद सतीश पंचम जी की चाय पीने को मिल जाये तो क्या बात!

बाकी मैंने कुछ अफवाहें सुनी हैं कि समीर लाल जी भी आला दर्जे के रसोइये हैं! उनको भी अपनी मंडली में लपेट लिया जाये, तो सोने पे सुहागा!

कौतुक जी, एक छोटी सी "साइड-जानकारी": जिस महिला की बात इस पोस्ट में हुयी है, वह अश्वेत है। अश्वेत लोगों की संस्कृति गोरे लोगों से काफी अलग होती है। इसके बारे में जल्द ही लिखने वाला हूँ।

अंत में, PD जी के लिये स्पेशल: जिस दोस्त की बात मैंने इस पोस्ट में लिखी है, आज ही उसकी शादी करवा के आ रहा हूँ। तो आपका तो चांस गया! कोई और मिलेगी तो आपका नाम जरूर सुझा दूंगा उसे! ;)

jamos jhalla ने कहा…

anil ji aapki baat kuch hadd tak theek hi lagtee hai lekin aajkal chote parivaaron ke chalan aur globlization ke chalte hamaaraa samaaz bhee badal rahaa hai .aaj kaa adhikaansh yuvaa varg hostle ke oobaau khaane ke bajaaye apne aap groups main ek doosre ke saath haath bataate hue apni pasand ka khaane ko prefare karne lagaa hai.

संगीता पुरी ने कहा…

समझदार लोगों में अब यह भेद समाप्‍त हो रहा है ... जब महिलाओं के हाथ में कलम और कीबोर्ड हैं तो पुरूषों के हाथ में कडाही और पैन क्‍यों नहीं हो सकते ... पर सामाजिक ढांचे को दोष देना भी गलत है ... मेरी लाख कोशिश के बाद भी मेरे बेटे रसोंई में बिल्‍कुल नहीं जाना चाहते ।

परमजीत बाली ने कहा…

हम तो अपना खाना खुद ही बनाते रहे हैं।;))

मुनीश ( munish ) ने कहा…

Sangeeta ji ,
Let boyz be boyz please. Even i can't imagine myself standing in a kitchen . Itz pure ladies domain and thats how it seems healthy.Regards.
munish

Babli ने कहा…

मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

आज तो आप ने छक्का लगाया है। यह धारणा बनना स्वाभाविक है। क्यों कि भारतीय पुरुष खाना बनाना जानना ही नहीं चाहते। हालांकि मैं ने दादा जी और पिता जी को खाना बनाते देखा और सिर्फ दस वर्ष की उम्र में पिता जी से खाना बनाना सीखा। विशेष अवसरों पर अधिक लोगों का भोजन बनाना हो तो पिताजी ही बनाते थे सब लोग उन की मदद करते थे।

rs00033@gmail.com ने कहा…

अनिल जी आज ही http://cartattack.blogspot.com/2009/04/blog-post_19.html ब्लॉग पर तशरीफ़ लायें तो मेहरबानी होगी.धन्यवाद्.

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi ने कहा…

बहुत खूब...

सार्थक प्रयास..

गहरी सोच...

वाह...

राजीव जैन Rajeev Jain ने कहा…

अनिलजी

पर शायद अब वक्‍त आ गया है कि भारतीय पुरुषों को किचन में भी मोर्चा संभालना पडेगा
वर्ना विदेश में रहने वाले तो कुंवारे ही रह जाएंगे।

वैसे अपन को सारा काम आता है

:))))

जितेन्द़ भगत ने कहा…

सवाल है कि‍ वि‍देशों में पति‍ खाना क्‍या बनाते हैं, वहॉं तो फास्‍ट फुड का सि‍स्‍टम है, साथ ही वे ओवन पर पकाना ज्‍यादा पसंद करते हैं,टाइम सेट कि‍या और खाना तैयार, भारत में तो 70प्रति‍शत लोग संभवत: आज भी मि‍ट्टीवाले चुल्‍हे पर खाना पकाते होंगे। रही बात हम सो-कॉल्‍ड पढ़े-लि‍खे भारतीयों की, आपकी बात सही है कि‍ हम कि‍चन में जाना ही नहीं चाहते, पर मेरा परि‍वार इससे जुदा है, मेरे पापा बि‍ना सब्‍जी काटे ऑफि‍स नहीं गए और मार्केट से सब्‍जी वगैरह वही लाते रहे। अब रि‍टायर हैं तो मजे से कि‍चन में हाथ बटाते है:)

-कौतुक ने कहा…

@जितेन्द्र भगत जी

यह बात गलत है कि वे केवल फास्ट फ़ूड ही खाते हैं. थोडा सा ब्रिटिश फ़ूड पर गूगल कर लिया जाये. आज हम जिस केक और कूकीज के दीवाने हैं वह भी वहीं से आता है. बारबेक्यू का नाम तो सुना ही होगा. और भी बहुत सी चीजें हैं.

Anil Pusadkar ने कहा…

हम तीन भाई साथ मे रहते हैं,मै और सबसे छोटा किचन से दूर ही रहते हैं लेकिन मंझला भाई ज़रूर किचन मे काम करता है,चाय से लेकर खाना तक़ बनाना उसे अच्छा लगता है,और वो बनाता भी बहुत अच्छा है।मेरे कुछ दोस्त भी खाना बहुत अच्छा बनाते है वो भी शौक से।ये तो अपनी-अपनी पसंद का सवाल है।

बी एस पाबला ने कहा…

जब 'वो' आयीं थी तो खाना बनाना तो हमने ही सिखाया था! घर से दूर रहते आदत जो पड़ गयी थी।

वैसे बताईयेगा कि जिस होटल/ रेस्टारेंट के खाने की तारीफें करते थकते नहीं, वहाँ रसोईया कौन था? पुरूष या महिला!? :-)

और दुनिया का सबसे मशहूर कुक कौन हुया है?

वैसे, राय सबकी एक जैसी हो, कोई ज़रूरी नहीं

Dr. Munish Raizada ने कहा…

इतने सारे जानकारों की टिप्पणिया पढने के बाद भी अपुन को तो यही लगता है की सब वे पर जा कर फ़ुट लॉन्ग "वेज्जी डी -लाइट " खाना ही भला. कौन ताम झाम में पड़े! फिर भारतीय चाय तो बनानी आती है है!

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

भाई हम तो सब कुछ सीख गये हैं..ये अलग बात है कि लठ्ठ खा खा कर सीखे हैं..पर अब सब कुछ बना लेते हैं.वैसे बैचलर लाईफ़ मे भी काफ़ी कुछ सीख गये थे.

रामराम.

shruti ने कहा…

i wish more men can learn from this.